Wednesday, July 27, 2011

ईश्वर के होने का अहसास...!!!

मै बेहद परेशान था, हर कदम पर आ रही मुश्किलों से हैरान था !
असफलताओं का दौर मुझे आस्तिक से नास्तिक बना रहा था !!
आज रात कोई मेरा अपना मेरे सपने मे आया, उन्होंने प्यार से मेरे बालों को सहलाया !
बोले बेटा....परेशान हो या मुझसे नाराज हो आजकल मंदिर से  तुम क्यों  दूर
दूर हो !!
मैंने नाराजगी मे  करवट बदली और सो गया,!
थोडा गुस्सा आया और  फिर से गहरी नींद मे खो गया ! !
उन्होंने फिर प्यार से मेरे बालों को सहलाया !
उन्होंने मुझ पर और प्यार व स्नेह लुटाया !!
बोले ,हाँ लोग मुझे पत्थर की  मूर्ति मे देखकर भागवान मानते है !
माना की मानव देवताओं को इंसानों से बढ़कर मानते है !!
लेकिन पत्थर तो मेरी प्रतिकृति है , भगवान  होना मेरी जिम्मेदारी !
लेकिन यथार्थ मे मै भी एक  इन्सान हूँ !!
मेरा भी मन है दिल धड़कता है मे भी अपनो से स्नेह करता हूँ !
और मेरा अपना कोई मुझसे रूठे तो मे भी दुखी होता हूँ !!
तू मुझे पत्थर नहीं सदा से है अपना मानता आया !
तुने हर मुश्किल ,हर दुःख  ,सफलता और ख़ुशी  को मुझसे बंटाया !!
इसीलिए तू मंदिर नहीं आया तो मै खुद चला आया !
मेरी भी मज़बूरी है जो बहुत बुरी है...!!
मे भगवान हूँ पर अपनों से  नहीं मिल सकता !
तू मेरा अपना है पर मै तेरे आंसू नहीं पोंछ सकता !!
हाँ बस इतना है की तुझमे विश्वास जगा सकता हूँ !
मै तेरे हर दम साथ हूँ यह जता सकता हूँ !!
उनकी बातों से मेरा मन पसीज गया !
आँखों से सटा तकिये का हिस्सा भीग गया !!
 मैंने आँखे खोली तो आँखें  भी भीगी थी !
उठकर देखा तो मेरे पास कोई नहीं बस उनके होने का आभास  था !
भगवान आज भी है यह विश्वास मेरे साथ था !!
शायद यह विश्वास ही ईश्वर के होने का अहसास था .....!!!

Sunday, May 8, 2011

माँ की मुस्कान ...

{ माँ को समर्पित... हितेश शुक्ला }


आप  खुश  हो तो मुझे ख़ुशी मिलती है !
जैसे मरुस्थल में नदी मिलती है !! 
आपकी ख़ुशी मेरा मनोबल बढाती है !
आपकी ख़ुशी मंजिल पाने की चाह जगाती है !!


आपकी मुस्कान दुःख मे सुख का आभास करवाती  है !!
आपकी ख़ुशी जीत की राह दिखलाती है !!
आपका मुस्कुराकर शुभकामनायें देना !
जैसे ईश्वर का मेरी सफलता सुनिश्चित कर देना !!


आपका मुस्कुराना निराशा में आशा जगाता है !
आपका मुस्कुराना जीवन जीने का उद्देश्य बताता है !!
जब आपकी आखों में ख़ुशी की चमक आती है !
चाँद और सूरज की रौशनी को फीका कर जाती है !!


आपकी मुस्कान मेरे प्राण है !
आपकी मुस्कान मेरी सफलता का सम्मान है !!
आपकी मुस्कान मेरे जीवन का ध्येय है !
आपकी मुस्कान मेरी समस्याओं का समाधान है !!


आपकी मुस्कान मेरी जीत का प्रमाण  है !
आपकी मुस्कान तपती दुपहरी में ठंडी छाँव का का अहसास है !!
आपकी मुस्कान कस्तूरी महक का आभास  है !
आपकी मुस्कुराहट मृत्यु के बाद का जीवन दान है !!
इसलिए माँ की मुस्कान में ही मेरा भगवान है.......!! 

Monday, January 24, 2011

हाँ देश में लोकतंत्र अपना जनाधार खो रहा है...


२६ जनवरी २०११ को हमारा गणतंत्र ६२ वर्ष का हो गया...यह गणतंत्र  दिवस कई प्रश्नों के साथ आया है बड़ा प्रश्न यह है की क्या देश गणतंत्र हो गया..??? जो कल्पना थी बापू की, जो कल्पना की थी लोकतंत्र के ग्रन्थ "संविधान" के रचनाकर आंबेडकर जी ने... क्या ये वही राष्ट्र है...जिसके संविधान मे देश के नागरिकों को स्वतंत्र घोषित किया गया था....लिखा था...यह एक लोकतंत्रात्मक गणराज्य या संप्रभु राष्ट्र है...यह सत्य है..??? क्या यह मान लें की "इस देश का भगवान ही मालिक है" देश की सर्वोच्च न्यायलय ने सही कहा है..??? या यह कह दिया जाये  की यह देश जिसकी लाठी उसकी भेंस की तर्ज पर चल रहा है...अर्थात जिसके  हाथ मे सत्ता वो संविधान से ऊपर हो गया... तिरंगे से बढ़कर हो गया...उनके लिए...संविधान के अंश रद्दी कागज पर लिखे ओचित्य हिन शब्दों की तरह हो गया... लगता है की इस देश मे लोकतंत्र है भी या नहीं...ये देश आजादी के बाद से ही एक परिवार की की बपोती हो गया... लगता नेहरु उर्फ़ वर्तमान गाँधी परिवार ने देश पर शासन करने का पेटेंट करा लिया है...आंबेडकर जी ने आरक्षण पिछड़े देश के कुछ पिछड़े देशवासियों को मुख्य धारा मे लाने के लिए दिया था.. ताकि उन पिछड़ चुके देशवासियों को स्वतंत्र होने का अहसास दिलाया जा सके... लेकिन ये आरक्षण सत्ता हथियाने का हथियार हो गया...अब मुस्लिम वोटों का गणित लगा कर उन्हें आरक्षण देने का प्रयास शुरू हो गया है...राजस्थान मे केवल एक समाज ने पुरे देश को हलाकान कर दिया... कल्पना कीजिये यदि एसा संघर्ष हर समाज ने छेड़ दिया तो...???आर्थिक आधार पर गरीब पिछड़ेपन पर आधारित आरक्षण देने के मुद्दे पर सबकी चुप्पी है...हाँ लोकतंत्र में कोन अपना जनधार खोना चाहेगा...लेकिन भरे मन से यह कहना पड़ता है...हाँ इस देश में लोकतंत्र अपना जनाधार खो रहा है...देश का वो युवा जिसे सब भाग्य विधाता कहते है  उसकी पढाई के लिए लोन आज कार खरीदने से  महंगा है और जटिल है...चार लाख करोड़ रुपये भ्रष्टाचार चाट गया...करोड़ों युवा बेरोजगारी की मार के चलते या तो गलत मार्ग चुन रहे है... या प्रतिभा को अवसरों को कमी के चलते...देश छोड़कर भागने को मजबूर है...और राजनितिक दल केवल सत्ता प्राप्ति ले जतन में लगे है...किसान आत्महत्या करते है तो बजाय कारण जानकर समाधान खोजने के सरकार को घेरने की तयारी हो जाती है..हत्या पर सियासत शुरू हो जाती है...जबकि संविधान में रचनात्मक विपक्ष की कल्पना में स्पष्ट कहा गया है की "विपक्ष सरकार को निरंकुश होने से रोकेगा साथ ही देश हित या राष्ट्रीय समस्या पर समाधान खोजना भी उसका दायित्व होगा सरकार के सुशासन देने में सहयोग करेगा...गलत नीतियों का विरोध भी करेगा " लेकिन यह असंभव हो गया है क्यों की यहाँ सब कुछ स्वार्थ और अर्थ से जुड़ गया है...देश में राष्ट्रीय एकता और अखंडता को भी नजर सी लग गयी है...नए राज्यों के निर्माण को लेकर लगातार होने वाले आंदोलनों से भय सा लगने लगा है...कहीं ये राज्यों की मांग करने वाले आन्दोलन विदेशी ताकतों के हाथ पड़कर किसी दिन अलग देश की मांग न कर बैठे....विश्व के सबसे बड़े गणतंत्र के लिए राष्ट्रिय सुरक्षा भी मुद्दा बन गया और चुनोती भी... कश्मीर के हालात जगजाहिर है....देश भर में..जब चाहे जहाँ चाहे बम के धमाके कर भारत को भर में चुनोती देकर चले जाते है... गिरफ़्तारी होने पर भी उन्हें नाजों से पाला जाता है...संसद पर हमले का दोषी हमारी जेल में बंद होने के बाद भी हम उसे फासी देने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे... कसाब की सेवा में आज भी देश का करोड़ों रूपया बर्बाद हो रहा है...तीस्ता, अरुंधती, बुखारी..यासीन जैसे  लोग तो देश और संविधान से भी बढ़कर हो गए...जिस देश में देश का झंडा तिरंगा नहीं फहरा सकते उसे लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता... जहाँ कृषि अर्थव्यवस्था का आधार हो फिर भी किसान कर्ज से मरे जा रहे हो... जहाँ बचपन मजदूरी में बीत रहा हो...जहाँ लाखों तन..बिना कपड़ों के हो... लाखों तन अनाज सड़ गल रहा लेकिन लोग भूख के कर्ण मर रहे हो... वहां लोकतंत्र मजबूत नहीं  बेचारा हो गया है कमजोर हो गया है है...और इस बेचारे लोकतंत्र की मजबूत कड़ी कोई हो सकती है तो वो इस देश की युवा शक्ति....!!!         
  

Sunday, January 23, 2011

तिरंगा फहराने से कोई नहीं रोक सकते....दम हो तो राहुल और उमर भी जाये लाल चौक तिरंगा फहराने

 26 जनवरी को  गणतंत्र दिवस है...भारत का अपना संविधान लागु हुआ  था....देश का राष्टीय ध्वज तिरंगा होगा...
 यह भी संविधान मे कहा गया  है...., तिरंगा हमारे स्वाभिमान का प्रतिक है....
 हमारे देश का प्रतिक है, वह आन बान और शान का प्रतिक है... उसके लिए लाखों माताओं  की गोद इसलिए सुनी हुई थी की तिरंगा इस देश मे शान से फहराया जा सके.... ,लाखों नव विवाहिताओं  की मांग का सिंदूर इसी तिरंगे को सम्मान से फहराएँ जाने के अधिकार के लिए कुर्बान हो गया...,कई बहनों की राखी कलाई को तरस रही थी क्यों की वो कलाई देश हित मे उठी थी जिसे अंग्रेजों ने काट दिया....लाखों बच्चों को इसी तिरंगे के खातिर अनाथ होना पड़ा... कई तो माँ की कोख मे ही थे और पिता  का साया उठ गया...कई विधवाओ युवतियों की अस्मिता से खेला गया क्यों की वो तिरंगे को ऊसका हक़ दिलाने की जंग मे अपने पिता,भाई,पति और बेटे से कदम ताल कर रही थी...कई बूढ़े माँ बाप इसलिए दम तोड़ चुके थे की उनका बुढ़ापे सहारा कोई नहीं बचा था...लेकिन आज वो तिरंगा आज भारत के एक प्रदेश मे फहराना चुनोती बन गया... वहां तिरंगा फहराने पर एसा माहोल तैयार किया जा रहा है जैसे कुछ युवा तिरंगा फहराने पाकिस्तान जा रहे हो....यासीन मालिक जैसे गुंडे आज तिरंगा न फहराने की चुनोती देकर भी छुट्टे घूम रहे है....तिरंगा फहराने जाने वालों को रोकने के लिए तिन हजार से अधिक सैनिक  तैनात किये जा रहे है...मुझे  समझ नहीं आ रहा  की   लाल चोक पर पाकिस्तानी झंडा  फहराया जाये तो हंगामा नहीं होगा और तिरंगा फहराने की बात आती है तो बवाल खड़ा कर दिया जाता है...विश्व का एस कोनसा देश है जहा के युवा वहां का झंडा नहीं फहरा सकते...आखिर क्यों कश्मीर के लाल चौक मे तिरंगा नहीं फहराया जा सकता...तिरगा भारत मे नहीं तो क्या पाकिस्तान इटली या वाशिंगटन मे फहराया जायेगा...दुर्भाग्य है देश का  भारतीय तिरंगा जला दिया  जाये लेकिन.... "वन्दे मातरम"  कहना  सांप्रदायिक हो गया....कश्मीर मे पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे खुलेआम लगाओ लेकिन भारत माता की जय कहना जैसे गुनाह  हो  गया....आतंकवादी  अफजल को फासी दी तो देश जल उठेगा...कसाब को सूली पर टांगा तो कश्मीर धधक उठेगा...कश्मीर के भारत मे  विलय प्रश्न खड़े करने वाली अरुंधती पर प्रकरण दर्ज नही किया गया...तब भी मसला कश्मीर को लेकर था.. सवाल देश पर था...किन्तु तब उमर अब्दुल्ला ने क्यों...अरुंधती को गिरफ्तार करने के आदेश नहीं दिए..आखिर क्यों... तिरंगा जलाने वाले... पाकिस्तान समर्थक नारे लगाने वाले...अफजल,कसाब के समर्थन मे बोलने वालों को आज तक जेल की सलाखों...मे बंद नहीं किया....????  आखिर क्यों अफजल को फासी नहीं दी जा रही...??? क्यों बटला हॉउस के शहीद की शाहदत पर प्रश्न चिन्ह लगाया जाता है...??? कांग्रेस चाहती है क्या है...उसे स्पष्ट करना चाहिए...क्या वह नहीं चाहती की लाल चौक पर पाकिस्तानी झंडे की जगह भर का तिरंगा लहराए...??? अगर हाँ तो उसे चाहिए...  भाजपा और कांग्रेस की राजनितिक प्रतिद्वंदिता से उठकर लाल चोक पर तिरंगा फहराने जाने जाने वाले युवाओं  को सुरक्षा देने के लिए... फौज की तैनाती करे न की तिरंगा फहराने जाने वालों को रोकने हेतु...
कांग्रेस को डर है की कही भाजपा को इसका रानीतिक लाभ न हो  जाये  तो उसे राहुल और उमर अब्दुल्ला को भी तिरंगा फहराने हेतु लाल चोक भेज देना चाहिए...लेकिन याद रहे भारत के युवाओ की नसों मे रक्त अभी  शेष है और जब तक भारत के लहू मे गर्मी और धमनियों श्वास शेष है.. तब तक कश्मीर तो क्या देश सीमा पर भी तिरंगा फहराने से   कोई नहीं रोक सकते....

अब युवा शक्ति कॆ गर्जन सॆ, संसद की दीवारॆं थर्रानॆं दॊ !!
काश्मीर के जर्रे-जर्रे मॆं अब, राष्ट्र-तिरंगा फ़हरानॆ दॊ..... !!

आओ  तिरंगा लाल चौक पर फहराएँ....अपना "युवधर्म" निभाए...
  

Tuesday, November 2, 2010

hiteshshukla01@rediffmail.com

क्या आपका मन नहीं दुखता भारत माँ के लिए ? दुखता है न फिर जागो भाई जागो....

जागो युवा साथियों देश फिर खतरे में है....
भारत  माता  का  ऋण चुकाओ ,अपना "युव धर्म " निभाओ,,
  न जाने इस झंडे के लिए  कितनो ने हँसते हँसते अपने प्राण समर्पित कर दिए,कितनो ने गीत लिखे ~~ जान भले जावे पर इसकी शान न जावे ~~हर १५ अगस्त , २६ जनवरी , २ अक्टोबर  को गला फाड़ फाड़ कर पूरा राजतन्त्र, पूरी नौकरशाही, सारा न्यूज़ मीडिया तिरंगा ये तिरंगा वो चिल्लाता है और जब आज कश्मीर मैं उसका इतना भरी अपमान हो रहा है तो सब चुप है कोने कोने कि न्यूज़ दिखने वाले न्यूज़ तंत्र इसे जान नहीं पाए इससे बड़ा झूठ  कुछ है क्या.......इन् तिरंगा जलने वालो को जब सरकार पैसा बाट रही है तो ये देश कह्ना सोया है ......कहा है वो १५० अरब लोग जिनका सब कुछ ये तिरंगा है ........जागो जागो ये भारत माता पुकार रही है .........भूल जाओ तुम हिन्दू हो भूल जाओ तुम मुस्लिम हो ..........भूल जाओ तुम कांग्रेस मैं हो , भूल जाओ तुम बीजेपी मैं हो.........बस याद रखो तुम भारतीय हो ...............और जनजागरण करो ...................हम दिन चार रहे न रहे पर तेरा वैभव अमर रहे माँ अमर रहेये सब देख कर मनं बहुत रो रहा है इसलए कडवी बात कह दी ............अखंड भारत वन्दे मातरम

ये हमारा सम्मान जल रहा है
हम क्यों चुप है


ये तिरंगा १५० अरब भारतीयों कि शान है क्यों चुप है


हमारे पूर्वजो ने इसके लिए सब दे दिया
क्यों चुप है


हम पर परिवार के साथ भारत माँ का भी हक है  
जागो युवा साथियों देश फिर खतरे में है....
भारत  माता  का  ऋण चुकाओ ,अपना "युव धर्म " निभाओ,,,

Monday, November 1, 2010

युद्ध का दर्शन विकसित करना चाहिए

युद्ध   का दर्शन विकसित करना चाहिए

arjuna_krishna_chariotदुर्भाग्य से हम अपने एक पड़ोसी देश, जो कल तक इस देश का ही एक अंग था, के साथ ऐसी स्थिति में जीने के लिए मजबूर हो गये हैं, जिसमें स्त्रायुतोड़क तनाव में जीना इस देश की नियति बन गया है। यह तनाव केवल भारत का ही नहीं है, पाकिस्तान भी इसमें पूरी तरह डूबा हुआ है। दोनों ही देशों के प्रबुद्ध नागरिकों की सद्इच्छाओं और सद्प्रयासों के बावजूद इस तनावपूर्ण स्थिति से मुक्ति का कोई उपाय नहीं दिखता। दोनों देशों की बिडम्बना यह है कि वे किसी क्षण आंखों में आंसू भरकर एक-दूसरे के गले लग जाते हैंऔर दूसरे क्षण आखें लाल कर, मुटि्ठयां भींचकर नथुनों से फुफकारते हुए एक-दूसरे पर झपट पड़ते हैं, प्रेम और घृणा का ऐसा ही खेल इस देश में कई हजार वर्ष पहले कौरवों और पाण्डवों के माध्यम से भी खेला गया था परिणाम, महाभारत जैसी त्रासदी थी। शांति की कितनी भी कामना क्यों न की जाए, युद्ध मनुष्य की नियति है। इसके बिना वह कभी जिया नहीं, न ही इसके बिना वह कभी जी सकेगा। पश्चिमी देशों में युद्ध के मनोविज्ञान पर बहुत काम हुआ है और वहां युद्ध के विभिन्न पहलुओं पर अनेक दृष्टियों और कोणों के आधार पर विचार किया गया है। हमारे देश में इस दृष्टि से विशेष चिंतन नहीं हुआ। जो थोड़ा-बहुत हुआ भी, वह गंभीर विचार या दर्शन के स्तर पर कभी नहीं उभरा। इस देश में भी बड़े-बड़े युद्ध हुए। महाभारत का युद्ध तो मनाव इतिहास की अद्वितीय घटना है। शायद उस युद्ध में हुए विनाश का व्याघात इतना प्रबल था कि इस देश की पूरी मानसिकता युद्ध-कर्म से केवल विरत ही नहीं हुई, उससे विरक्ति भी अनुभव करने लगी। हमारा संपूर्ण चिंतन आत्मा, परमात्मा, मोक्ष, माया और सृष्टि की उत्पत्ति की गुत्थियों से सुलझाने की ओर मुड़ गया। यह चिंतन बढ़ते-बढ़ते इस स्थिति तक पहुंच गया, जहां सारा संसार और उसके सभी कार्य-कलाप मिथ्या दिखने लगे, केवल ब्रह्मा ही एक मात्र सत्य रह गया।
इस देश में सुगठित ढंग से युद्ध दर्शन का विकास न हो पाने का एक प्रमुख कारण यह है कि यहां जीवन-मृत्यु की सभी समस्याओं का अंतर्भेदन व्यक्ति मुखी हुआ, समाजमुखी नहीं। आध्यात्मिक और भौतिक क्षेत्रों के विविध आयामों पर चिंतन-मनन करते हुए इस देश में अनेक शास्त्रों की रचना हुई, किन्तु युद्ध-दर्शन पर कोई उल्लेखनीय शास्त्र नहीं रचा गया। युद्ध का अपना एक कौशल है। इससे आगे बढ़कर उसका एक पूरा दर्शन है। इस बात पर इस देश में गंभीर चिंतन नहीं हुआ। प्राचीनकाल से यहां चार पुरुषार्थों की चर्चा होती रही, जिन्हें पुरुषार्थ चतुष्ट कहा जाता है। ये हैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। यदि ध्यान से देखा जाए तो ये चारों पुरुषार्थ व्यक्ति के निजी जीवन से ही अधिक संबंध रखते हैं, इनका पूरे समाज, पूरे देश, पूरे राष्ट्र के साथ संबंध होना आवश्यक नहीं हैं, किन्तु युद्ध एकाकी संक्रिया न होकर सामूहिक कर्म है। युद्ध कर्म पूरे समाज के साथ जुड़कर ही पूर्ण होता है। इस देश में धर्म पर बहुत कुछ सोचा और लिखा गया। मोझ की कामना से हमारे शास्त्र भरे पड़े हैं। अर्थक और कुटिल राजनीति पर चाणाक्य जैसे मनीषियों ने बहुत कुछ लिखा। काम की तो यहां पूजा होती रही। हमारे अनेक मंदिरों में निर्मित मिथुन-मूर्तियां इस बात का प्रमाण हैं। ॠषि वात्सायन का ‘काम सूत्र’संसार की बेजोड़ रचना है, परंतु मुझे ऐसा कोई ग्रंथ याद नहीं आता जो युद्ध, युद्ध-कला और युद्ध दर्शन की व्यापकता को समाहित करता हो। इस देश की समाज-व्यवस्था में युद्ध धर्म, समाज के केवल एक वर्ग, क्षत्रियों, तक ही सीमित रह गया । पूरे समाज में यह वर्ग कभी दस प्रतिशत से अधिक नहीं था। नब्बे प्रतिशत जनता इससे विरत थी और इसे अपना काम नहीं मानती थी। क्षत्रिय वर्ग में परंपरा के रूप में शस्त्र-पूजा अवश्य होती थी, किन्तु उनके लिए भी यह मात्र एक रुढ़ी बनकर रह गई थी। संसार के विभिन्न भागों में किस प्रकार के नए अस्त्र-शस्त्र बन रहे हैं, इसके विषय में उन्हें कोई जानकारी नहीं थी।
युद्ध एक पूरा दर्शन है, जीवन दृष्टि है, इस बात को संभवतः सबसे पहले गुरुगोविन्द सिंह ने, तीन सौ वर्ष पहले, आत्मसात किया था। उन्होंने अनुभव किया था कि कृपाण हाथ में लेकर युद्ध भूमि में जाकर शत्रु से भिड़ जाना ही पर्याप्त नहीं है। यह काम तो इस देश की क्षत्रिय जातियां सदियों से करती आ रही हैं। आवश्यकता यह थी कि युद्ध-कर्म को किस प्रकार लोगों की मानसिकता का हिस्सा बना दिया जाए, उनके लिए यह एक पूरा जीवन दर्शन बन जाए। सबसे बड़ी बात यह है कि इस कर्म में केवल दस प्रतिशत लोगों को नहीं, शत-प्रतिशत लोगों की भागीदारी कैसे प्राप्त की जाए।
गुरुगोविन्द सिंह ने इस कार्य को संपन्न करने के लिए व्यक्ति और समाज के उद्देश्य बदल दिये। ‘जब आव (आयु) की अवधि निदान बने अति ही रण में जूझ मरो’ का आदर्श लोगों के सामने रख दिया। ‘सवा लाख से एक लड़ाऊं’ का निश्चय प्रकट किया। हरि, बनवारी, गोपाल, केशव, माधव बंशीधर, रण छोड़दास, रास बिहारी जैसे इष्टनामों के स्थान पर खड्गकेतु, असिपाणि, बाणपाणि, चक्रपाणि, दुष्टहंता, अरिदमन, सर्वकाल, महाकाल जैसे युद्ध-प्रकृति के नाम प्रचारित किये और इस दर्शन की पुष्टि आश्रय में रखे हुए कवियों से करवाई। उन्होंने लोगों के नाम बदल दिए। गुरुगोविन्द सिंह ने सबसे महत्वपूर्ण कार्य यह किया कि उन्होंने पिछड़े हुए दलित, उपेक्षित, पीड़ित और कमजोर लोगों में ऐसा आत्मविश्वास उत्पन्न कर दिया कि कुछ समय बाद ही दुर्दान्त आक्रमणकारियों का मुकाबला करने, उन्हें पराजित करने और विश्व के सर्वश्रेष्ठ सैनिक होने का गौरव प्राप्त करने में सफल हो गए। युद्ध दर्शन का मूलमंत्र यह है कि इतने दुर्बल कभी न बनो कि किसी के मन में आपको लूटने और गुलाम बनाने का लोभ उत्पन्न हो जाए। गुरू तेगबहादुर की उक्ति है-’भय काहू को देति नहि, ना भय मानत आनि’ किसी को भयभीत करो, न ही किसी का भय मानो। इस कथन में किसी को भयभीत न करो, न किसी का भय मानो, जीतना किसी से भयभीत न होना है। दुर्बल व्यक्ति या राष्ट्र किसी को भयभीत कैसे करेगा। शक्तिशाली व्यक्ति या राष्ट्र ही, किसी का भय नहीं मानता, वहीं किसी को भयभीत न करने की समझ और सामर्थ्य प्राप्त कर सकता है। भारत की राष्ट्रनीति शान्ति, अहिंसा और विश्व बंधत्व के आदर्श पर आग्रहशील रही है। ये महत्वपूर्ण मानवीय मूल्य हैं। हमारी अपेक्षा यही रही है कि संसार के सभी लोग, सभी राष्ट्र इन आदर्शों को अपनाएं और इन पर चलें,किन्तु इतिहास का अनुभव कुछ और ही प्रमाणित करता है। हम ऊंचे-ऊंचे आदर्शों की बातें करते रहे और सदियों तक बाहरी आक्रमणकारी आततायी बनकर हमें लूटते रहे, गुलाम बनाते रहे और हमारा शोषण करते रहे। पिछले वर्षों का इतिहास भी तो यही प्रमाणित करता है। यह देश पंचशील के आदर्श को सारे संसार के सम्मुख रखा और विश्व शांति की कामना की। अभी पंचशील के घोषणा पत्र की स्याही सूखी भी नहीं थी कि इस घोषणा पत्र के एक प्रमुख भागीदार चीन ने भारत की उत्तरी-पूर्वी सीमाओं को अपने सैन्य बल से रौंद दिया और हम बुरी तरह पिट गए।
जनता भी इस देश के साथ अपने अच्छे संबंध बनाना चाहती है, किन्तु दुर्भाग्य से इन दो देशों के मध्य कश्मीर की समस्या गले की ही हड्डी बन कर फंसी हुई है। राजनीतिक स्तर पर कूटनीतिक वार्ता द्वारा शायद इसका कोई समाधान निकल भी आता, किन्तु दोनों देशों की राजनीतिक स्थितियां ऐसी हैं कि सभी प्रयास सफलता की किसी मंजिल पर पहुंचने से पहले ही बिखर जाते हैं। भारत में, सभी संकटों के बावजूद लोकतंत्र बना रहा है, किन्तु पाकिस्तान में लोकतंत्र का कदम चलता है फिर लड़खड़ा कर सैनिक शासन की गोद में जा गिरा। सैनिक शासन की अपनी कुछ प्राथमिकताएं होती हैं और मजबूरियां भी। उसे सदैव यह अशंका बनी रहती है कि हल्का सा भी ‘साफ्ट’ रुख जनता में उसकी साख को बिगाड़ देगा। इसीलिए कठोर भाषा बोलना, आक्रमक तेवर बनाए रखना और कुछ न कुछ दुस्साहन प्रदर्शित करते रहना उसके लिए आवश्यक है। एक बिडम्बना यह भी है कि पाकिस्तान में जब भी लोकतंत्र आया, वह भी वहां की सेना की धौंस भय से कभी मुक्त नहीं हुआ। लोकतांत्रिक पद्धति से चुनी हुई सरकार भी सेना की ठकुरसुहाती करते रहने में ही अपनी खैरियत समझती रही है। यदि कोई राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री सेना के प्रभाव को कम करना चाहता है तो सेना द्वारा तख्ता पलट की तलवार उसे भयभीत किए रखती है। आजकल तो वहां की सरकार तालिबानी उग्रवादियों की आतंकी घटनाओं से बुरी तरह संशकित है। एक बात और ध्यान में रखने की है, जो जनसमूह कबायली मानसिकता में पलता है वह अधिक दुर्दान्त और आक्रामक होता है। भारत की समृध्दि और उसकी शांति प्रियता, प्राचीनकाल से मध्य एशिया के विभिन्न कबीलों को इस देश पर आक्रमण करने, इसे लूटने, इस पर शासन करने के लिए लालायित करती रही। यूनानियों, हूणों और शकों के बाद अरबों, तुर्कों, पठानों, मुगलों के कबीले लगभग एक हजार वर्षाें तक इस देश में हमलावर बनकर आते रहे और इस देश की समृध्दि को तहस-नहस करते रहे। इन कबीलों ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था। ये कबीले इस्लाम धर्म स्वीकार न भी करते तो भी वही करते जो इन्होंने किया। चंगेज खां जैसा आक्रान्ता मुसलमान नहीं था। उसके वंशजों ने बाद में इस्लाम स्वीकार किया। तैमूर लंग, बाबर और नादिरशाह की सेनाओं के हाथों भारत के मुसलमान भी उतने ही पीड़ित हुए थे, जितने हिन्दू।
पाकिस्तान आज भी कबाइली मानसिकता से बुरी तरह ग्रस्त है। उत्तरी-पश्चिमी सरहदी सूबे के पठान कबाइली उसी परिवेश और मानसिकता में आज भी जी रहे हैं, जिसमें कई सौ वर्ष पहले जी रहे थे। इन्हें लड़ने-भिड़ने, युद्ध करने और अपनी कबाइली मानसिकता को तृप्त करने के लिए सदैव दुश्मन की जरूरत रहती है-वह चाहे अपने घर का हो या बाहर का। अफगानिस्तान के विभिन्न कबीले कितने ही वर्षो से आपस में लड़ रहे हैं और इस संघर्ष में लाखों लोगों की आहूति दे चुके हैं। पाकिस्तान के शासक यह अच्छी तरह जनते हैं कि यदि इन कबाइलियों का मुख किसी दूसरे देश की ओर न मोड़ा गया तो ये खुद पाकिस्तान के लिए बड़ी मुसीबत बन जाएंगे। यह निशाना भारत के अतिरिक्त दूसरा कौन सा देश हो सकता है? स्वतंत्रता प्राप्त होने के दो महीने बाद ही पाकिस्तानी शासकों ने इस कबाइलियों का मुंह कश्मीर की तरफ मोड़ दिया था। उस समय इन लोगोें ने कश्मीरियों पर जो जुल्म ढाये थे, उनकी यादें आज भी रोंगटे खड़े कर देती हैं। पिछली आधी सदी से पाकिस्तान कश्मीर में जो प्राक्सी वार लड़ रहा है। भारत का पिछले एक हजार वर्ष का इतिहास कबाइलियों के हाथों त्रस्त होने का है। ये लोग अहिंसा, शांति, बंधुता, सद्भाव की भाषा नहीं सकझते। इनके संस्कार हिंसा और युद्ध को, इनकी मानसिकता का अविभाज्य अंग बना देते हैं। इसीलिए इनसे इसी भाषा में संवाद करना होता है। गुरुगोविन्द सिंह ने इस मानसिकता को इच्छी तरह समझा था। उनके युद्ध दर्शन की प्रेरक भूमिका यह मानसिकता ही थी। उन्होंने जो मंत्र दिया, उसके परिणामस्वरूप इतिहास की धारा ही बदल गई। हरि सिंह नलवा जैसे सेनानियों ने इन कबाइलियों की ऐसी गति बनाई कि वे अपने ही घर में पनाह मांगने लगे। नलवे की सेनाओं ने उन्हें दर्रा खैबर के उस ओर खंदेड़ दिया। इतिहास आज भी वैसे ही युद्ध दर्शन की अपेक्षा कर रहा है।
- डॉ. महीप सिंह