Friday, March 28, 2025

हिन्दू नववर्ष गुड़ी पड़वा विक्रम संवत 2082



 

चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को गुड़ी पड़वा या नववर्ष का आरम्भ माना गया है। ‘गुड़ी’ का अर्थ होता है विजय पताका । 

इसे हिन्दू नव वर्ष ,नव संवत्सर या नव संवत् भी कहते हैं। 

30 मार्च 2025 को युगाब्ध 5127 विक्रम संवत् 2082  प्रारंभ होगा । इस वर्ष विक्रम संवत का नाम "सिद्दार्थ" होगा एवं राजा सूर्य होंगे । विक्रम संवत् के नये साल का आरम्भ भी होता है। चैत्र शुक्ल द्वितीया को सिंधी नववर्ष चेटीचंड उत्सव से शुरू होता है । इस शुभ दिन भगवान् झूलेलाल का जन्म हुआ था जो वरूण देव के अवतार हैं। 

             चैत्रे मासि जगत् ब्रह्म ससर्ज प्रथमे हनी

              शुक्ल पक्षे समग्रे तु तदा सूर्योदये सति 

       ब्रह्मा जी ने सूर्योदय होने पर सबसे पहले चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सृष्टि की संरचना शुरू की। उन्होंने इसे प्रतिपदा तिथि को प्रवरा अथवा सर्वोत्तम तिथि कहा था। इसलिए इसको सृष्टि का प्रथम दिवस भी कहते हैं। इस दिन से संवत्सर का पूजन, नवरात्र घटस्थापन, ध्वजारोपण, पाठ आदि विधि-विधान किए जाते हैं।चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा वसन्त ऋतु में आती है। इस ऋतु में सम्पूर्ण सृष्टि में सुन्दर छटा बिखर जाती है। विक्रम संवत के महीनों के नाम आकाशीय नक्षत्रों के उदय और अस्त होने के आधार पर रखे गए हैं। सूर्य, चन्द्रमा की गति के अनुसार ही तिथियाँ भी उदय होती हैं। मान्यता है कि इस दिन दुर्गा जी के आदेश पर श्री ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी। इस दिन दुर्गा जी के मंगलसूचक घट की स्थापना की जाती है।

    आज भी हमारे भारत देश में प्रकृति, शिक्षा तथा राजकीय कोश आदि के चालन-संचालन में मार्च अप्रेल के रूप में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही देखते हैं। यह समय दो ऋृतुओं का संधिकाल माना जाता है। इसमें रात्रि छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं। प्रकृति एक नया रूप धारण कर लेती है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रकृति नव पल्लव धारण कर नव संरचना के लिए ऊर्जावान हो रही हो। मानव, पशु-पक्षी यहाँ तक की जड़-चेतन प्रकृति भी प्रमाद एवं आलस्य का परित्याग कर सचेतन हो जाती है। इसी समय बर्फ पिघलने लग जाती है। आमों पर बौर लगना प्रारम्भ हो जाता है। प्रकृति की हरितिमा नवजीवन के संचार का प्रतीक बनकर हमारे जीवन से जुड़ सी जाती है।

    प्रतिपदा के दिन आज से 2082 वर्ष पूर्व उज्जयिनी नरेश महाराज विक्रमादित्य ने विदेषी आक्रांत से भारत भूमि की रक्षा की और इसी दिन से कालगणना प्रारम्भ की गई।  उपकृत राष्ट्र ने भी उन्हीं महाराज के नाम से विक्रमीसंवत् का नामकरण किया। महाराज विक्रमादित्य ने आज से 2072 वर्ष पूर्व राष्ट्र को सुसंगठित कर  अरब में विजय की पताका फहरा दी। साथ ही साथ यवन, हूण, तुषार, पारसिक तथा कम्बोज देशों पर अपनी विजय ध्वजा फहरा दी। विजय की स्मृति स्वरूप वर्ष प्रतिपदा संवत्सर के रूप में मनाई जाती रही और आज भी बड़े उत्साह एवं ऐतिहासिक धरोहर की स्मृति के रूप में मनाई जा रही है।  राजा विक्रमादित्य ने विजय के बाद जब राज्यारोहण हुआ तब उन्होंने प्रजा के तमाम ऋणों को माफ कर दिया तथा नये भारतीय कैलेण्डर को जारी किया, जिसे विक्रम संवत् नाम दिया।

 चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नए साल का आरम्भ मानते हैं । हिन्दू पंचांग का पहला महीना चैत्र होता है ।शक्ति और भक्ति के नौ दिन यानी कि  चैत्र नवरात्रि घटस्थापना का पहला दिन भी यही है । मान्यता है कि इस दिन नक्षत्र शुभ स्थिति में आ जाते हैं और किसी भी नए काम को शुरू करने के लिए यह मुहूर्त शुभ होता है ।

     भारत भर के सभी प्रान्तों में यह नव-वर्ष विभिन्न नामों से मनाया जाता है जो दिशा व स्थानानुसार सदैव मार्च-अप्रेल के माह में ही पड़ता है  गुड़ी पड़वा, होला मोहल्ला, युगादि, विशु, वैशाखी, कश्मीरी नवरेह, उगाडी, चेटीचंड, चित्रैय तिरुविजा आदि सभी की तिथि इस नव संवत्सर के आसपास ही आती है।

सबसे प्राचीन काल गणना के आधार पर ही प्रतिपदा के दिन विक्रमी संवत् के रूप में इस शुभ एवं शौर्य दिवस को अभिषिक्त किया गया है। इसी दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामचन्द्रजी के राज्याभिषेक अथवा रोहण के रूप में मनाया गया। यह दिन वास्तव में असत्य पर सत्य की विजय को याद करने का दिवस है। इसी दिन  महाराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हुआ था।अगर ज्योतिष की माने तो प्रत्येक संवत् का एक विशेष नाम होता है विभिन्न ग्रह इस संवत् के राजा, मंत्री और स्वामी होते हैं इन ग्रहों का असर वर्ष भर दिखाई देता है सिर्फ यही नहीं समाज को श्रेष्ठ (आर्य) मार्ग पर ले जाने के लिए स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन को ‘आर्य समाज’ स्थापना दिवस के रूप में चुना थाद्य इसी शुभ दिन महर्षि दयानन्द ने आर्यसमाज की स्थापना की थी। यह दिवस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक श्री केशव बलिराम हेडगेवार के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। पूरे भारत में इसी दिन से चैत्र नवरात्र की शुरूआत मानी जाती है। 


वैदिक संस्कृति से जोड़ता है हमें विक्रम संवत् -

 

  विक्रम संवत् ही हमें अपनी संस्कृति से जोड़ता है। भारतीय संस्कृति से जुड़े सभी समुदाय विक्रम संवत् को एक साथ बिना प्रचार और नाटकीयता से परे होकर मनाते हैं और इसका अनुसरण करते हैं दुनिया का लगभग हर कैलेण्डर सर्दी के बाद बसंत ऋतु से ही प्रारम्भ होता है। यही नहीं इस समय प्रचलित ईस्वी सन वाला कैलेण्डर को भी मार्च के महीने से ही प्रारंभ होता है । इस कैलेण्डर को बनाने में कोई नयी खगोलीय गणना करने के बजाए सीधे से भारतीय कैलेण्डर (विक्रम संवत) में से ही लिया गया है ।


हिंदी  12 महीनों के नाम -

      पृथ्वी द्वारा 365 व 366 दिन में होने वाली सूर्य की परिक्रमा को वर्ष और इस अवधि में चंद्रमा द्वारा पृथ्वी के लगभग 12 चक्कर को आधार मानकर कैलेण्डर तैयार किया गया  । क्रम संख्या के आधार पर उनके नाम रखे गए हैं । हिंदी महीनों के 12 नाम  इस प्रकार है  -  चैत्र, बैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन ।

हम कैसे मनायें नव वर्ष-नव संवत्सर -

इस भारतीय और वैदिक नव वर्ष की पर हमें दीपदान करना चाहिये। घरों में घण्टा-घडियाल व शंख बजाकर मंगल ध्वनि से नव वर्ष का स्वागत करें। इष्ट मित्रों को एसएमएस, इमेल एवं दूरभाष से नये वर्ष की शुभकामना भेजना प्रारम्भ कर देना चाहिये। नव वर्ष के दिन प्रातःकाल से पूर्व उठकर मंगलाचरण कर सूर्य को प्रणाम करें। हवन कर वातावरण शुद्ध करें। नये संकल्प करें। नवरात्रि के नो दिन साधना के शुरू हो जाते हैं तथा नवरात्र घट स्थापना की जाती है।

नव वर्ष का स्वागत करने के लिए अपने घर-द्वार को आम के पत्तों से अशोक पत्र से द्वार पर बन्दनवार लगाना चाहिये। नवीन वस्त्राभूषण धारण करना चाहिये। इसी दिन प्रातःकाल स्नान कर हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प और जल ले कर ‘ओम भूर्भुवः स्वः संवत्सर-अधिपति आवाहयामि पूजयामि च’ मंत्र से नव संवत्सर की पूजा करनी चाहिये एवं नव वर्ष के अशुभ फलों के निवारण हेतु ब्रह्माजी से प्रार्थना करनी चाहिये। हे भगवन्! आपकी कृपा से मेरा यह वर्ष मंगलमय एवं कल्याणकारी हो। इस संवत्सर के मध्य में आने वाले सभी अनिष्ट और विघ्न शांत हो जाये।

    नव संवत्सर के दिन नीम के कोमल पत्तों और ऋतु काल के पुष्पों का चूर्ण बनाकर उसमें काली मिर्च, नमक, हींग, जीरा, मिश्री, इमली और अजवाइन मिलाकर खाने से रक्त विकार आदि शारीरिक रोग होने की संभावना नहीं रहती है तथा वर्षभर हम स्वस्थ रह सकते हैं। इतना न कर सके तो कम-से-कम चार-पाँच नीम की कोमल पत्त्यिाँ ही सेवन कर ले तो पर्याप्त रहता है। इससे चर्मरोग नहीं होते हैं। महाराष्ट्र में तथा मालवा में पूरनपोली या मीठी रोटी बनाने की प्रथा है। मराठी समाज में गुड़ी सजाकर भी बाहर लगाते हैं। यह गुड़ी नव वर्ष की पताका का ही स्वरूप है। गुड़ी का अर्थ विजय पताका होती है। ‘युग‘ और ‘आदि‘ शब्दों की संधि से बना है ‘युगादि‘ । आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में ‘उगादि‘ और महाराष्ट्र में यह पर्व ‘गुड़ी पड़वा‘ के रूप में मनाया जाता है। विक्रमादित्य द्वारा शकों पर प्राप्त विजय तथा शालिवाहन द्वारा उन्हें भारत से बाहर निकालने पर इसी दिन आनंदोत्सव मनाया गया । इसी विजय के कारण प्रतिपदा को घर-घर पर ‘ध्वज पताकाएं’ तथा ‘गुढि़यां’ लगाई जाती है गुड़ी का मूल ३संस्कृत के गूर्दः से माना गया है जिसका अर्थ चिह्न, प्रतीक या पताका दृपतंग .आदि- कन्नड़ में कोडु जिसका मतलब है चोटी, ऊंचाई, शिखर, पताका आदि। मराठी में भी कोडि का अर्थ है शिखर, पताका। हिन्दी-पंजाबी में गुड़ी का एक अर्थ पतंग भी होता है। आसमान में ऊंचाई पर फहराने की वजह से इससे भी पताका का आशय स्थापित होता है

सच तो यह है कि विक्रम संवत् ही हमें अपनी संस्कृति की याद दिलाता है और कम से कम इस बात की अनुभूति तो होती है कि भारतीय संस्कृति से जुड़े सारे समुदाय इसे एक साथ बिना प्रचार प्रसार और नाटकीयता से परे हो कर मनाते हैं। हम सब भारतवासियों का कर्तव्य है कि पूर्ण रूप से वैज्ञानिक और भारतीय कैलेण्डर विक्रम संवत् के अनुसार इस दिन का स्वागत करें। पराधीनता एवं गुलामी के बाद अंग्रेजों ने हमें एक ऐसा रंग चढ़ाया कि हम अपने नव वर्ष को भूल कर-विस्मृत कर उनके रंग में रंग गये। उन्हीं की तरह एक जनवरी को नव वर्ष अधिकांश लोग मनाते आ रहे हैं। लेकिन अब देशवासी को अपनी भारतीयता के गौरव को याद कर नव वर्ष विक्रमी संवत् मनाना चाहिये । 


हितेश शुक्ला 

लेखक - माखन लाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के शोधार्थी है ।भारतीयता और राष्ट्रीय विचारों के लिए लिखते है ।

Sunday, May 15, 2022

उजाला हर हाल में आएगा

तमस घनघोर छाया हो 
असत्य की चहुँओर माया हो
उजाला हर हाल में आयेगा
अंधेरा भाग जाएगा
जानकी की तरह आस रखना
राम पर विश्वास रखना
समुंदर लांघ आएंगे
कपट को चीर जाएंगे
थोड़ी देर जरूर होगी
भले देना होगी
परीक्षा अग्नि की
फिर तो धर्म जीतेगा
सत्य भी जीत जाएगा
असत्य जब हार जाएगा
अंधेरा पनाह ढूंढेगा
उजाला बड़ा दयालु है
राम की तरह कृपालु है
दिया उसे भी जगह देगा
अपने तले में बिठा लेगा
अधर्म का नाश जब होगा
धर्म का राज तब होगा
हर ओर उजाला लाएगी
रोशनी जगमगाएगी
अंधेरों को मिटाएगी 
धर्म ध्वजा लहरायेगी
दीवाली भी तभी आएंगी
राम का राज संग लाएगी.. ।। 
 -: हीतेश शुक्ला

Monday, March 21, 2022

यूपी में भाजपा की जीत के स्क्रिप्ट राइटर है श्री सुनील बंसल

अभाविप की पाठशाला में रचे बसे और तैयार होकर जब देश की  भावी पीढ़ी को राष्ट्रवाद से जोड़ने के काम मे तन्मयता से लगे थे ।  जेएनयू में वामपंथीयों की जड़ हिलाने और दिल्ली विश्वविद्यालय में कांग्रेस अन्य को उखाड़ने वाला नाम सुनील जी ही है । प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और  श्री अमित शाह  और रणनीति कारों ने उनकी क्षमता को  पहचानने वालो ने  उनको  न केवल भाजपा में बुलाया गया  बल्कि  सनागठनात्मक रूप से बिल्कुल कमजोर हो चुके उत्तर प्रदेश का काम सौपा । तो  सिवाय निकट से जानने पहचानने वाले अभाविप और संघ के चुनिंदा लोगों के अलावा किसी ने नही सोचा होगा कि सुनील जी उत्तरप्रदेश जैसे चुनोतीपूर्ण और टेढी मेढ़ी पथरीली राह वाले पूरी तरह  बाहुबली धनबल से संचालित राजनैतिक ढांचे वाले प्रदेश में भेजा तो गया है लेकिन क्या वे सफल हो पाएंगे । लेकिन उन्होंने  सदैव संगठन निर्देश को अपना प्रण मांन कर प्राण झोंक देने वाले परिश्रम से भाजपा की उत्तर प्रदेश में पूर्ण  बहुमत से वापसी  के साथ इतना बड़ा करिश्मा कर  दिखाया जिसका देश  का कोई राजनीतिक पंडित आंकलन नही कर सकता था ।कोई भाजपा का पीके यो कोई जूनियर अमित शाह कहता है । उत्तर प्रदेश जैसे कठिन राज्य जहां स्वानुशासन से नियंत्रण शब्द  सोच से भी परे है वह भी किसी राजनैतिक दल में  लेकिन यह सब साकार कर दिखाने का करिश्मा कर दिखाने वाला नाम है सुनील बंसल । उत्तर भाजपा के संगठन महामंत्री प्रबंधन ,भाजपा उत्तर प्रदेश  की जीत,   कुशल चुनाव संचालक ,जनता की नब्ज जानने वाले और कार्यकर्ताओं को उनकी खूबी केअनुरूप तराशने वाले एक राजनैतिक कार्यकर्ता के  रूप में जाने जाते है ।  सुनील जी के काम को अभाविप के दौरान बहुत करीब से देखा  बहुत संजीदगी के साथ हर काम को करना और जिस आम से आम  काम को  करना उसे ही खास बना देना ।  बेहद ही कुशल वक्ता सुनील जी  हिमाचल प्रदेश के ऊना  में आयोजित अभाविप के राष्ट्रीय अधिवेशन में  राष्ट्रीय सुरक्षा विषय पर उनका वक्तव्य उस अधिवेशन  में उपस्थित देश भर की छात्र शक्ति के दिल दिमाग पर छपने वाला था ।  उन्होंने देश के युवाओं को गजनी की अलार्म की भूमिका देते हुए कहा था" देशद्रोहियों के खिलाफ  देश को जगाने वाली अलार्म की तरह है " । साथ ही  तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा और भ्रष्टाचार के लिए  बदनाम राजग सरकार के  विरुद्ध शंखनाद का आह्वान भी तभी से किया था ।  उंसके बाद भ्रष्टाचार के विरुद्ध  बड़ा अभियान का नेतृत्व कर सरकार पर देश भर में हल्लाबोलने वाले बंसल जी के  कार्यशैली के मुरीद और अनुयायियों को बड़ी संख्या राजस्थान और उत्तरप्रदेश ही नही देश भर में है ।

सुनील बंसल  जी के फेसबुक को ही खंगाल लिया जाए तो उनके अथक परिश्रम की कहानी स्वतः सामने आजाती है  लेकिन केवल सोशल मिडिया तक नही उसका 10 गुना बिना प्रचार के परिश्रम करते है । जब लोकसभा चुनाव के बाद अप्रत्याशित सफलता के श्रेय को  बधाइयाँ देने वालो ने बात की तो जवाब होता था गंभीरता से जवाब आताः था विधानसभा जितना है । विधानसभा जितने पर जब बात करने पर उनका लक्ष्य अगला लोकसभा हो गया । लोकसभा जाते ही वो भाजपा को  फिर से आनेवाले समय और स्थानीय चुनावों की चुनोतियो से निपटने के लिए तैयार करने में जुट गए ।  केवल चुनाव नही संगठन निधि हो या सदस्यता या कोई राष्ट्रीय अभियान उत्तर प्रदेश भाजपा के काम का अगुआ राज्य बनकर उभर गया ।   तमाम सुविधाओ से सुसज्जित वार रूम  से लैस  कार्यालयों की श्रंखला और कार्यालय से  कार्यकर्ताओ को जोड़ने का क्रम खड़ा कर  उत्तर प्रदेश के चरमराये  सनागठनात्मक ढांचे की एक  सुसंगठित स्वरूप दे दिया जिसका लाभ इस चुनाव में भाजपा को मिला ।  उत्तर प्रदेश जीस प्रकृति का राज्य है वहाँ टिकिट वितरण के बाद असंतोष की आवाज तक न आना  बड़ी उपलब्धि  है ।  बेहद शालीन और मृदुभाषी लेकिन काम को लेकर जरा भी कोताही सहन नही करने वाले  सुनील  जी को हर काम मे परफेक्शन पसंद है ।  वे  बहुत अच्छे वक्ता कुशल संगठन कर्ता के साथ बेहतरीन लेखक भी है
  पिछले चुनाव  हो या अन्य अभियान इसके दौरान सैकड़ों नारे और स्लोगन खुद लिखते है । हर अच्छा सुझाव और काम की बात छोटे से छोटे स्थान से मिले सुझाव या बात को  वे बहुत ध्यान से सुनकर डायरी में नोट करना नही भूलते । बंसल जी के नित नूतन चिर पुरातन, और सगठन के लिए कोई कार्यकर्ता अनिवार्य और अपरिहार्य नही है , वे  जीती जागती कार्यकर्ताओं के निर्माण की पाठशाला है  ।व्यक्तित्व में  कृतित्व मेंअभाविप के प्रशिक्षण के वाक्य हर पल झलकते है ।  उन्हें कुशल प्रबंधक के दायरे में बांधना अनुचित होगा ।  अभाविप के 60 वर्ष होने पर किताब" एक आंदोलन देश के लिए" प्रकाशन के दौरान  चर्चा में  बोला शब्द उनके व्यक्तित्व को बयान करता है उनका कहना था कि  हमेशां  बड़े दिखने की  और बोलने की नही बड़े करने की कोशिश में लगे रहना चाहिए । और  बड़ा करने के बाद भी उसका श्रेय लेने की  बजाय देने में विश्वास रखो । अच्छा अगर आप बिल में छुप कर भी करोगे तब भी खुद ब खुद जग जाहिर हो जाएगा । यही कारण है कि सुनील बंसल जी भाजपा की जीत को गढ़ने और रचने महत्वपूर्ण भूमिका निर्वहन करने के बाद  टीवी चैनलों के सामने  निरंतर अपने नेतृत्व  प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी  मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी और  संगठन के प्रत्येक कार्यकर्ताओं को श्रेय दे रहे  थे । सुनील बंसल जी के रूप में भाजपा को देश भर में कार्यकर्ताओं के  गढ़ने वाले शिल्पकार के साथ सगठनात्मक काम को आगे बढ़ाने वाला कार्यकर्ता या यह कहा जाए कि भाजपा को  नई पीढ़ी समझने  मन को पढ़ने वाला कुशल रणनीतिकार और  कुशल संगठक मिल गया है ।
 -: हितेश शुक्ला