Friday, May 6, 2016

शस्त्र शास्त्र के पारंगत और कर्मवीर भगवान परशुराम


{9 मई अक्षयतृतीया भगवान परशुराम जयन्ती} 
परशुराम जी ने कभी क्षत्रियों को संहार नहीं किया. उन्होंने हैहयवंशीय क्षत्रिय  वंश में उग आई उस खर पतवार को साफ किया जिससे क्षत्रिय वंश की साख खत्म होती जा रही थी. जिस दिन भगवान परशुराम को योग्य क्षत्रियकुलभूषण प्राप्त हो गया उन्होंने स्वत दिव्य परशु सहित अस्त्र-शस्त्र राम के हाथ में सौंप दिए

जन्म
जमदग्नि अत्यन्त तेजस्वी महर्षि थे।उनका विवाह प्रसेनजित की कन्या रेणुका से हुआ। रेणुका से उनके पाँच पुत्र हुये जिनके नाम थे रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्’वानस और परशुराम।
भगवान परशुराम का जन्म अक्षय तृतीया को हुआ था ! परशुराम भगवान विष्णु के आवेशावतार है। जी बाल्यकाल से ही ये पार्वती वल्लभ भगवान शंकर की आराधना करने कैलास पर्वत पर चले गये। देवाधिदेव महादेव ने प्रसन्न होकर इन्हें अनेक अस्त्र-शस्त्रों सहित दिव्य परशु प्रदान किया। वह दिव्य परशु भगवान शंकर के उसी महातेज से निर्मित हुआ था जिससे श्री विष्णु के सुदर्शन चक्र और देवराज इंद्र का वज्र बना था। अत्यंत तीक्ष्ण धारवाला अमोघ परशु धारण करने के लिए भगवान ‘राम’का परशु सहित नाम ‘परशुराम’पड़ा।
  परशुराम जी बाल्यकाल से ही अत्यंत वीर, पराक्रमी, अस्त्र-शस्त्र विद्या के प्रेमी, त्यागी, तपस्वी एवम्  सुंदर थे। धनुर्वेद की विधिवत् शिक्षा इन्होंने अपने  पिता से ही प्राप्त की थी।
माता भक्त, पिता के आज्ञाकारी परशुराम जी
श्रीमद्भागवत में दृष्टान्त है कि एक बार माता रेणुका हवन हेतु गंगा तट पर जल लेने व सरितास्नान के लिये गई। गन्धर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ विहार करता देख आसक्त हो गयी और कुछ देर तक वहीं रुक गयीं। हवन काल व्यतीत हो जाने से क्रुद्ध मुनि जमदग्नि ने अपनी पत्नी के आर्य मर्यादा विरोधी आचरण एवं मानसिक व्यभिचार करने के दण्डस्वरूप सभी पुत्रों को अपनी माँ का वध कर देने की आज्ञा दी। रुक्मवान, सुखेण, वसु और विश्’वानस ने माता के मोहवश अपने पिता की आज्ञा नहीं मानी, किन्तु परशुराम ने पिता की आज्ञा मानते हुये अपनी माँ का सिर काट डाला। अपनी आज्ञा की अवहेलना से क्रोधित होकर जमदग्नि ने अपने चारों पुत्रों को जड़ हो जाने का शाप दे दिया और परशुराम से प्रसन्न होकर वर माँगने के लिये कहा। इस पर परशुराम बोले कि हे पिताजी! मेरी माता जीवित हो जाये और उन्हें अपने मरने की घटना का स्मरण न रहे। परशुराम जी ने यह वर भी माँगा कि मेरे अन्य चारों भाई भी पुनः चेतन हो जायें और मैं युद्ध में किसी से परास्त न होता हुआ दीर्घजीवी रहूँ। जमदग्नि जी ने परशुराम को उनके माँगे वर दे दिये।
संहार की शपथ
इस घटना के कुछ काल पश्चात एक दिन जमदग्नि ऋषि के आश्रम में कार्त्तवीर्य अर्जुन आये। जमदग्नि मुनि ने कामधेनु गौ की सहायता से कार्त्तवीर्य अर्जुन का बहुत आदर सत्कार किया। कामधेनु गौ की विशेषतायें देखकर कार्त्तवीर्य अर्जुन ने जमदग्नि से कामधेनु गौ की माँग की किन्तु जमदग्नि ने उन्हें कामधेनु गौ को देना स्वीकार नहीं किया। इस पर कार्त्तवीर्य अर्जुन ने क्रोध में आकर जमदग्नि ऋषि का वध कर दिया और कामधेनु गौ को अपने साथ ले जाने लगा। किन्तु कामधेनु गौ तत्काल कार्त्तवीर्य अर्जुन के हाथ से छूट कर स्वर्ग चली गई और कार्त्तवीर्य अर्जुन को बिना कामधेनु गौ के वापस लौटना पड़ा।
इस घटना के समय वहाँ पर परशुराम उपस्थित नहीं थे। जब परशुराम वहाँ आये तो उनकी माता छाती पीट-पीट कर विलाप कर रही थीं। अपने पिता के आश्रम की दुर्दशा देखकर और अपनी माता के दुःख भरे विलाप सुन कर परशुराम जी ने इस पृथ्वी पर से  हैहयवंशीय क्षत्रिय राजाओं के संहार करने की शपथ ले ली। पिता का अन्तिम संस्कार करने के पश्चात परशुराम ने कार्त्तवीर्य अर्जुन से युद्ध करके उसका वध कर दिया। इसके बाद उन्होंने इस पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से रहित कर दिया और उनके रक्त से समन्तपंचक क्षेत्र में पाँच सरोवर भर दिये। अन्त में महर्षि ऋचीक ने प्रकट होकर परशुराम को ऐसा घोर कृत्य करने से रोक दिया। अब परशुराम ब्राह्मणों को सारी पृथ्वी का दान कर महेन्द्र पर्वत पर तप करने हेतु चले गये हैं
न्याय के लिए हमेशा युद्ध करते रहे
वे न्याय के लिए हमेशा युद्ध करते रहे, कभी भी अन्याय को बर्दाश्त नहीं किया. न्याय के प्रति उनका समर्पण इतना अधिक था कि उन्होंने हमेशा अन्यायी को खुद ही दण्डित भी किया । 
अमर है, परशुराम जी
  कठिन तप से प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने उन्हें कल्प के अंत तक तपस्यारत भूलोक पर रहने का वर दिया।
अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनुमांश्च विभीषण
कृपरू परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनरू।। - श्रीमद्भागवत महापुराण
 पौराणिक परंपरा में जिन सात व्यक्तियों को अजर अमर माना गया है, उनमें परशुराम एक हैं। कहते हैं कि राम के शौर्य, पराक्रम और धर्मनिष्ठा को देख कर वे हिमालय चले गए थे। उन्होंने बुद्धिजीवियों और धर्मपुरुषों की रक्षा के लिए उठाया परशु त्याग दिया।
 तप, स्वाध्याय शिक्षण और लोकसेवा छोड़कर आपद्धर्म के रूप में शस्त्र उठाने का प्रायश्चित करने के लिए हिमालय क्षेत्र में समय व्यतीत किया। क्योंकि परशुराम चिरजीवी हैं, इसलिए माना जाता है कि आज भी सशरीर वे हिमालय के किन्हीं अगम्य क्षेत्रों में निवास करते हैं। परशुराम का कार्य क्षेत्र गोमांतक (गोवा) कहा जाता है। राम से साक्षात्कार होने और उन्हें अवतार के रूप में पहचानने के बाद वे हिमालय चले गए। ऋषि धर्म के विपरीत शस्त्र उठाने का प्रायश्चित करने के लिए कहते हैं कि परशुराम ने हिमालय की घाटी में फूलों की घाटी बसाई।
समाज सुधार व कृषि के प्रकल्प हाथ में लिए
 परशुराम जी ने समाज सुधार व कृषि के प्रकल्प हाथ में लिए। केरल,कोंकण मलबार और कच्छ क्षेत्र में समुद्र में डूबी ऐसी भूमि को बाहर निकाला जो खेती योग्य थी। इस समय कश्यप ऋषि और इन्द्र समुद्री पानी को बाहर निकालने की तकनीक में निपुण थे। अगस्त्य को समुद्र का पानी पी जाने वाले ऋषि और इन्द्र का जल-देवता इसीलिए माना जाता है। परशुराम ने इसी क्षेत्र में परशु का उपयोग रचनात्मक काम के लिए किया। शूद्र माने जाने वाले लोगों को उन्होंने वन काटने में लगाया और उपजाउ भूमि तैयार करके धान की पैदावार शुरु कराईं। इन्हीं को परशुराम ने शिक्षित व दीक्षित करके ब्राहम्ण बनाया। इन्हें जनेउ धारण कराए। और अक्षय तृतीया के दिन एक साथ हजारों युवक-युवतियों को परिणय सूत्र में बांधा। परशुराम द्वारा अक्षयतृतीया के दिन सामूहिक विवाह किए जाने के कारण ही इस दिन को परिणय बंधन का बिना किसी मुहूर्त्त के शुभ मुहूर्त्त माना जाता है। दक्षिण का यही वह क्षेत्र हैं जहां परशुराम के सबसे ज्यादा मंदिर मिलते हैं और उनके अनुयायी उन्हें भगवान के रुप में पूजते हैं
मार्शल आर्ट में योगदान
भगवान परशुराम शस्त्र विद्या के श्रेष्ठ जानकार थे। परशुराम केरल के मार्शल आर्ट कलरीपायट्टु की उत्तरी शैली वदक्कन कलरी के संस्थापक आचार्य एवं आदि गुरु हैं।ख्1, वदक्कन कलरी अस्त्र-शस्त्रों की प्रमुखता वाली शैली है।

       -हितेश शुक्ला, पत्रकारिता-  शोध छात्र एवं
 प्रदेश मीडिया प्रभारी भारतीय जनता युवा मोर्चा ,मध्य प्रदेश
mob . 9407463777


Thursday, July 30, 2015

देशभक्त कलाम को प्रणाम....

                   
   हे कलाम... फिर किसी अशिअम्मा जैनुलाब्दीन जैसी माँ की कोख से किसी जैनुलाब्दीन मराकायर पिता के घर में... भारत माँ का गौरव बढाने भारत भूमि पर जल्दी आना.... और ईश्वर से प्रार्थना है उन्हें स्वर्ग में स्थान न दे भारत की भूमि को स्वर्ग बनाने उन्हें फिर से इस भूमि पर भेजे " देशभक्त कलाम को प्रणाम .....

Saturday, March 21, 2015

मैं दुबारा इस देश में पैदा होना चाहता हूं ताकि इसकी सेवा कर सकूं.....



                                      23 मार्च शहीद दिवस          


भगत सिंह
देश के स्वतंत्रता संग्राम में हजारों ऐसे नौजवान भी थे, जिन्होंने ताकत के बल पर आजादी दिलाने की ठानी और क्रांतिकारी कहलाए। भारत में जब भी क्रांतिकारियों का नाम लिया जाता है तो पहला नाम शहीद भगत सिंह का आता है।
भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को पंजाब के जिला लायलपुर में बंगा गांव (जो अब पाकिस्तान में है) में हुआ था। भगत सिंह के पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम सरदारनी विद्यावती कौर था। उनके पिता और उनके दो चाचा अजीत सिंह व स्वर्ण सिंह भी अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लडाई का एक हिस्सा थे। जिस समय भगत सिंह का जन्म हुआ उस समय ही उनके पिता व चाचा को जेल से रिहा किया गया था। भगत सिंह की दादी ने बच्चे का नाम भागां वाला (अच्छे भाग्य वाला) रखा। बाद में उन्हें भगत सिंह कहा जाने लगा। एक देशभक्त परिवार में जन्म लेने की वजह से ही भगत सिंह को देशभक्ति का पाठ विरासत के तौर पर मिला।
सुखदेव -
सुखदेव थापर का जन्म पंजाब के शहर लायलपुर में श्री रामलाल थापर व श्रीमती रल्ली देवी के घर विक्रमी सम्वत 1964 के फाल्गुन मास में शुक्ल पक्ष सप्तमी तदनुसार 15 मई 1907 को अपरान्ह पौने ग्यारह बजे हुआ था। जन्म से तीन माह पूर्व ही पिता का स्वर्गवास हो जाने के कारण इनके ताऊ अचिन्तराम ने इनका पालन पोषण करने में इनकी माता को पूर्ण सहयोग किया। सुखदेव की तायी जी ने भी इन्हें अपने पुत्र की तरह पाला। इन्होंने भगत सिंह, कॉमरेड रामचन्द्र एवं भगवती चरण बोहरा के साथ लाहौर में नौजवान भारत सभा का गठन किया था।
लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिये जब योजना बनी तो साण्डर्स का वध करने में इन्होंने भगत सिंह तथा राजगुरु का पूरा साथ दिया था। यही नहीं, सन् 1928 में जेल में कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार किये जाने के विरोध में राजनीतिक बन्दियों द्वारा की गयी व्यापक हड़ताल में बढ-चढकर भाग भी लिया था। गान्धी-इर्विन समझौते के सन्दर्भ में इन्होंने एक खुला खत गान्धी के नाम अंग्रेजी में लिखा था जिसमें इन्होंने महात्मा जी से कुछ गम्भीर प्रश्न किये थे।
राजगुरु -
शिवराम हरि राजगुरु का जन्म भाद्रपद के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी सम्वत् 1965 (विक्रमी) तदनुसार सन् 1908 में पुणे जिला के खेडा गाँव में हुआ था। 6 वर्ष की आयु में पिता का निधन हो जाने से बहुत छोटी उम्र में ही ये वाराणसी विद्याध्ययन करने एवं संस्कृत सीखने आ गये थे। इन्होंने हिन्दू धर्म-ग्रंन्थों तथा वेदो का अध्ययन तो किया ही लघु सिद्धान्त कौमुदी जैसा क्लिष्ट ग्रन्थ बहुत कम आयु में कण्ठस्थ कर लिया था। इन्हें कसरत (व्यायाम) का बेहद शौक था और छत्रपति शिवाजी की छापामार युद्ध-शैली के बडे प्रशंसक थे।
वाराणसी में विद्याध्ययन करते हुए राजगुरु का सम्पर्क अनेक क्रान्तिकारियों से हुआ। चन्द्रशेखर आजाद से इतने अधिक प्रभावित हुए कि उनकी पार्टी हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी से तत्काल जुड़ गये। आजाद की पार्टी के अन्दर इन्हें रघुनाथ के छद्म-नाम से जाना जाता थाय राजगुरु के नाम से नहीं। पण्डित चन्द्रशेखर आजाद, सरदार भगत सिंह और यतीन्द्रनाथ दास आदि क्रान्तिकारी इनके अभिन्न मित्र थे। राजगुरु एक अच्छे निशानेबाज भी थे। साण्डर्स का वध करने में इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव का पूरा साथ दिया था जबकि चन्द्रशेखर आजाद ने छाया की भाँति इन तीनों को सामरिक सुरक्षा प्रदान की थी।
23 मार्च और आखिरी के साढ़े तीन घंटे..
23 मार्च का दिन उन आम दिनों की तरह ही शुरू हुआ जब सुबह के समय राजनीतिक बंदियों को उनके बैरक से बाहर निकाला जाता था। आम तौर पर वे दिन भर बाहर रहते थे और सूरज ढलने के बाद वापस अपने बैरकों में चले जाते थे। लेकिन आज वार्डन चरत सिंह शाम करीब चार बजे ही सभी कैदियों को अंदर जाने को कह रहा था। सभी हैरान थे, आज इतनी जल्दी क्यों। पहले तो वार्डन की डांट के बावजूद सूर्यास्त के काफी देर बाद तक वे बाहर रहते थे। लेकिन आज वह आवाज काफी कठोर और दृढ़ थी। उन्होंने यह नहीं बताया कि क्यों? बस इतना कहा, ऊपर से ऑर्डर है।
चरत सिंह द्वारा क्रांतिकारियों के प्रति नरमी और माता-पिता की तरह देखभाल उन्हें दिल तक छू गई थी। वे सभी उसकी इज्जत करते थे। इसलिए बिना किसी बहस के सभी आम दिनों से चार घंटे पहले ही अपने-अपने बैरकों में चले गए। लेकिन सभी कौतूहल से सलाखों के पीछे से झांक रहे थे। तभी उन्होंने देखा बरकत नाई एक के बाद कोठरियों में जा रहा था और बता रहा था कि आज भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा।
हमेशा की तरह मुस्कुराने वाला बरकत आज काफी उदास था। सभी कैदी खामोश थे, कोई कुछ भी बात नहीं कर पा रहा था। सभी अपनी कोठरियों के बाहर से जाते रास्ते की ओर देख रहे थे। वे उम्मीद कर रहे थे कि शायद इसी रास्ते से भगत सिंह और उनके साथी गुजरेंगे।
फांसी के दो घंटे पहले भगत सिंह के वकील मेहता को उनसे मिलने की इजाजत मिल गई। उन्होंने अपने मुवक्किल की आखिरी इच्छा जानने की दरखास्त की थी और उसे मान लिया गया। भगत सिंह अपनी कोठरी में ऐसे आगे-पीछे घूम रहे थे जैसे कि पिंजरे में कोई शेर घूम रहा हो। उन्होंने मेहता का मुस्कुराहट के साथ स्वागत किया और उनसे पूछा कि क्या वे उनके लिए दि रेवोल्यूशनरी लेनिन नाम की किताब लाए हैं। भगत सिंह ने मेहता से इस किताब को लाने का अनुरोध किया था। जब मेहता ने उन्हें किताब दी, वे बहुत खुश हुए और तुरंत पढ़ना शुरू कर दिया, जैसे कि उन्हें मालूम था कि उनके पास वक्त ज्यादा नहीं है। मेहता ने उनसे पूछा कि क्या वे देश को कोई संदेश देना चाहेंगे, अपनी निगाहें किताब से बिना हटाए भगत सिंह ने कहा, मेरे दो नारे उन तक पहुंचाएं..इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद। मेहता ने भगत सिंह से पूछा आज तुम कैसे हो? उन्होंने कहा, हमेशा की तरह खुश हूं। मेहता ने फिर पूछा, तुम्हें किसी चीज की इच्छा है? भगत सिंह ने कहा, हां मैं दुबारा इस देश में पैदा होना चाहता हूं ताकि इसकी सेवा कर सकूं। भगत ने कहा, सुभाष चंद्र बोस ने जो रुचि उनके मुकदमे में दिखाई उसके लिए धन्यवाद करें।
11 घंटे पहले लिया गया फांसी का फैसला

अंग्रेज सरकार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी देने का मतलब अच्छी तरह से जानती थी। उसे पता था कि इन तीनों नौजवानों को फांसी देने से पूरा देश उठ खड़ा होगा, लेकिन उसे ये भी पता था कि अगर ये तीनों जिंदा रहे तो जेल में बैठे-बैठे ही क क्रांति का बिगुल बजा देंगे, इसलिए भगत सिंह को फांसी देने के लिए पूरा सीक्रेट प्लान तैयार किया गया और 23 मार्च यानी फांसी के दिन से सिर्फ 11 घंटे पहले ये तय किया गया कि भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु को कब फांसी देनी है। अंग्रेज सरकार ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को उसी दिन फांसी की खबर दी, जिस दिन उन्हें फांसी पर चढ़ाया जाना था।
मेहता के जाने के तुरंत बाद अधिकारियों ने भगत सिंह और उनके साथियों को बताया कि उन्हें फांसी का समय 11 घंटा घटाकर कल सुबह छह बजे की बजाए आज साम सात बजे कर दिया गया है। भगत सिंह ने मुश्किल से किताब के कुछ पन्ने ही पढ़े थे। उन्होंने कहा, क्या आप मुझे एक अध्याय पढ़ने का भी वक्त नहीं देंगे? बदले में अधिकारी ने उनसे फांसी के तख्ते की तरफ चलने को कहा। एक-एक करके तीनों का वजन किया गया। फिर वे नहाए और कपडे पहने। वार्डन चतर सिंह ने भगत सिंह के कान में कहा, वाहे गुरु से प्रार्थना कर ले। वे हंसे और कहा, मैंने पूरी जिंदगी में भगवान को कभी याद नहीं किया, बल्कि दुखों और गरीबों की वजह से कोसा जरूर हूं। अगर अब मैं उनसे माफी मांगूगा तो वे कहेंगे कि यह डरपोक है जो माफी चाहता है क्योंकि इसका अंत करीब आ गया है।
तीनों के हाथ बंधे थे और वे संतरियों के पीछे एक-दूसरे से ठिठोली करते हुए सूली की तरफ बढ़ रहे थे। उन्होंने फिर गाना शुरू कर दिया-कभी वो दिन भी आएगा कि जब आजाद हम होंगे, ये अपनी ही जमीं होगी ये अपना आसमां होगा। शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालों का बाकी यही नाम-ओ-निशां होगा।श्
जेल की घडी में साढ़े छह बज रहे थे। कैदियों ने थोडी दूरी पर, भारी जूतों की आवाज और जाने-पहचाने गीत, सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है की आवाज सुनी। उन्होंने एक और गीत गाना शुरू कर दिया, माई रंग दे मेरा बसंती चोला और इसके बाद वहां इंकलाब जिंदाबाद और हिंदुस्तान आजाद हो के नारे लगने लगे। सभी कैदी भी जोर-जोर से नारे लगाने लगे।
तीनों को फांसी के तख्ते तक ले जाया गया। भगत सिंह बीच में थे। तीनों से आखिरी इच्छा पूछी गई तो भगत सिंह ने कहा वे आखिरी बार दोनों साथियों से गले लगना चाहते हैं और ऐसा ही हुआ। फिर तीनों ने रस्सी को चूमा और अपने गले में खुद पहन लिए। फिर उनके हाथ-पैर बांध दिए गए।
शाम 7.33 बजे दी गई फांसी

जल्लाद ने ठीक शाम 7.33 बजे रस्सी खींच दी और उनके पैरों के नीचे से तख्ती हटा दी गई। उनके दुर्बल शरीर काफी देर तक सूली पर लटकते रहे फिर उन्हें नीचे उतारा और जांच के बाद डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।सब कुछ शांत हो चुका था। फांसी के बाद चरत सिंह वार्ड की तरफ आया और फूट-फूट कर रोने लगा। उसने अपनी तीस साल की नौकरी में बहुत सी फांसियां देखी थीं, लेकिन किसी को भी हंसते-मुस्कराते सूली पर चढ़ते नहीं देखा था, जैसा कि उन तीनों ने किया था।
23 मार्च 1931 को शाम 7.30 बजे भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर जेल में फांसी दे दी गई थी। भगत सिंह की उम्र वक्त महज 23 साल थी, वो हमेशा कहा करते थे,‘हमारी शहादत में ही हमारी जीत है।’ भगत सिंह ने महात्मा गांधी का सम्मान किया, लेकिन कई मामलों पर उनके मतभेद थे ये बात सभी जानते हैं, लेकिन 23 साल के भगत सिंह उस समय अंग्रेजों के लिए महात्मा गांधी से भी बड़ी चुनौती बन गये थे। भगत सिंह ने बिना कोई पद यात्रा किए, बिना हजारों लोगों को जुटाए सिर्फ अपने और चंद साथियों के दम अंग्रेजों को लोहे के चने चबाने को मजबूर कर दिया था। शायद यही कारण रहा कि 23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फांसी दे दी गई। फांसी पर जाने से पहले वे लेनिन की नहीं बल्कि राम प्रसाद बिस्मिल की जीवनी पढ़ रहे थे। कहा जाता है कि जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनके फांसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले। फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले -ठीक है अब चलो।
रात के अंधेरे में शवों के साथ वहशियाना सलूक
अंग्रेजों ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी खबर को बहुत गुप्त रखा था, लेकिन फिर भी ये खबर फैल गई और लाहौर जेल के बाहर लोग जमा होने लगे। अंग्रेज सरकार को डर था कि इस समय अगर उनके शव परिवार को सौंपे गए तो क्रांति भड़क सकती है। ऐसे में उन्होंने रात के अंधेरे में शवों के टुकड़े किये और बोरियों में भरकर जेल से बाहर निकाला गया। शहीदों के शवों को फिरोजपुर की ओर ले जाया गया, जहां पर मिट्टी का तेल डालकर इन्हें जलाया गया, लेकिन शहीद के परिवार वालों और अन्य लोगों को इसकी भनक लगी तो वे उस तरफ दौड़े जहां आग लगी दिखाई दे रही थी। इससे घबराकर अंग्रेजों ने अधजली लाशों के टुकड़ों को उठाया और सतलुज नदी में फेंककर भाग गये। परिजन और अन्य लोग वहां आए और भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के शवों को टुकड़ों को नदी से निकालाकर उनका विधिवत अंतिम संस्कार किया।
शहादत के बाद भड़की चिंगारी और मिली,हमें आजादी
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत की खबर को मीडिया ने काफी प्रमुखता से छापा। ये खबर पूरे देश में जंगल की आग तरह फैल गई। हजारों युवाओं ने महात्मा गांधी को काले झंडे दिखाए। सच पूछें तो देश की आजादी के लिए आंदोलन को यहीं से नई दिशा मिली, क्योंकि इससे पहले तक आजादी के कोई आंदोलन चल ही नहीं रहा था। उस वक्त तो महात्मा गांधी समेत अन्य नेता अधिकारों के लिए लड़ रहे थे, लेकिन भगत सिंह पूर्ण स्वराज की बात करते थे, जिसे बाद में अपनाया और हमें आजादी मिल सकी।
                                                                                      -  हितेश  शुक्ला 

Friday, March 20, 2015

नव वर्ष पर विशेष ...गुड़ी पड़वा , हिन्दू नववर्ष या चैत्र शुक्ल प्रतिपदा



   
चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को गुड़ी पड़वा या नववर्ष का आरम्भ माना गया है। ‘गुड़ी’ का अर्थ होता है विजय पताका । ऐसा माना गया है कि शालिवाहन नामक कुम्हार के पुत्र ने मिट्टी के सैनिकों का निर्माण किया और उनकी एक सेना बनाकर उस पर पानी छिड़ककर उनमें प्राण फूँक दिये। उसमें सेना की सहायता से शक्तिशाली शत्रुओं को पराजित किया। इसी विजय के उपलक्ष्य में प्रतीक रूप में ‘‘शालीवाहन शक’ का प्रारम्भ हुआ। पूरे महाराष्ट्र में बड़े ही उत्साह से गुड़ी पड़वा के रूप में यह पर्व मनाया जाता है। हिन्दुओं द्वारा नववर्ष के रूप में एक महत्वपूर्ण उत्सव की तरह इसे मनाया जाता है।
इसे हिन्दू नव संवत्सर या नव संवत् भी कहते हैं।इस वर्ष 21 मार्च 2015 को कीलक नामक विक्रम संवत् 2072 का प्रारंभ होगा । 21 मार्च 2015 (शनिवार) को इस धरा की 1955885115 वीं वर्षगांठ है । ऐसी मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा ने इसी दिन सृष्टि की रचना प्रारम्भ की थी। इसी दिन से विक्रम संवत् के नये साल का आरम्भ भी होता है। सिंधी नववर्ष चेटीचंड उत्सव से शुरू होता है जो चैत्र शुक्ल द्वितीया को मनाया जाता है। सिंधी मान्यताओं के अनुसार इस शुभ दिन भगवान् झूलेलाल का जन्म हुआ था जो वरूण देव के अवतार हैं। 
चैत्रे मासि जगत् ब्रह्म ससर्ज प्रथमे हनि
शुक्ल पक्षे समग्रे तु तदा सूर्योदये सति॥ 
कहा जाता है कि ब्रह्मा ने सूर्योदय होने पर सबसे पहले चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सृष्टि की संरचना शुरू की। उन्होंने इसे प्रतिपदा तिथि को प्रवरा अथवा सर्वोत्तम तिथि कहा था। इसलिए इसको सृष्टि का प्रथम दिवस भी कहते हैं। इस दिन से संवत्सर का पूजन, नवरात्र घटस्थापन, ध्वजारोपण, वर्षेश का फल पाठ आदि विधि-विधान किए जाते हैं।चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा वसन्त ऋतु में आती है। इस ऋतु में सम्पूर्ण सृष्टि में सुन्दर छटा बिखर जाती है। विक्रम संवत के महीनों के नाम आकाशीय नक्षत्रों के उदय और अस्त होने के आधार पर रखे गए हैं। सूर्य, चन्द्रमा की गति के अनुसार ही तिथियाँ भी उदय होती हैं। मान्यता है कि इस दिन दुर्गा जी के आदेश पर श्री ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी। इस दिन दुर्गा जी के मंगलसूचक घट की स्थापना की जाती है।
आज भी हमारे भारत देश में प्रकृति, शिक्षा तथा राजकीय कोश आदि के चालन-संचालन में मार्च अप्रेल के रूप में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही देखते हैं। यह समय दो ऋृतुओं का संधिकाल माना जाता है। इसमें रात्रि छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं। प्रकृति एक नया रूप धारण कर लेती है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रकृति नव पल्लव धारण कर नव संरचना के लिए ऊर्जावान हो रही हो। मानव, पशु-पक्षी यहाँ तक की जड़-चेतन प्रकृति भी प्रमाद एवं आलस्य का परित्याग कर सचेतन हो जाती है। इसी समय बर्फ पिघलने लग जाती है। आमों पर बौर लगना प्रारम्भ हो जाता है। प्रकृति की हरितिमा नवजीवन के संचार का प्रतीक बनकर हमारे जीवन से जुड़ सी जाती है।
इसी प्रतिपदा के दिन आज से 2072 वर्ष पूर्व उज्जयिनी नरेश महाराज विक्रमादित्य ने विदेषी आक्रांत शकों से भारत भूमि की रक्षा की और इसी दिन से कालगणना प्रारम्भ की गई।  उपकृत राष्ट्र ने भी उन्हीं महाराज के नाम से विक्रमीसंवत् का नामकरण किया। महाराज विक्रमादित्य ने आज से 2072 वर्ष पूर्व राष्ट्र को सुसंगठित कर शकों की शक्ति का जड़ से उन्मूलन कर देश से पराजित कर भगा दिया और उनके मूल स्थान अरब में विजय की पताका फहरा दी। साथ ही साथ यवन, हूण, तुषार, पारसिक तथा कम्बोज देशों पर अपनी विजय ध्वजा फहरा दी। इन्हीं विजय की स्मृति स्वरूप वर्ष प्रतिपदा संवत्सर के रूप में मनाई जाती रही और आज भी बड़े उत्साह एवं ऐतिहासिक धरोहर की स्मृति के रूप में मनाई जा रही है। इनके राज्य में कोई चोर या भिखारी नहीं था। विक्रमादित्य ने विजय के बाद जब राज्यारोहण हुआ तब उन्होंने प्रजा के तमाम ऋणों को माफ कर दिया तथा नये भारतीय कैलेण्डर को जारी किया, जिसे विक्रम संवत् नाम दिया।
हिन्दू मान्यताओं के अनुसार, यह दिन सृष्टि रचना का पहला दिन हैद्य करीब एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 111 वर्ष पूर्व इसी दिन ब्रह्मा जी ने जगत की रचना की थी । इस दिन चैत्र नवरात्रि भी प्रारंभ होती है । हिन्दू परम्परा के अनुसार इस दिन को ‘नव संवत्सर’ या ‘नव संवत’ के नाम से भी जाना जाता है ।
पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री के अनुसार हिंदू पंचांग के मुताबिक, इस वर्ष 21 मार्च 2015 को कीलक नामक विक्रम संवत् 2072 का प्रारंभ होगाद्य 21 मार्च 2015 को इस धरा की 1955885115 वीं वर्षगांठ है । इसी दिन ब्रह्मा जी ने जगत की रचना प्रारंभ की थी । इसीलिए हम चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नए साल का आरम्भ मानते हैंद्य हिन्दू पंचांग का पहला महीना चैत्र होता हैद्य यही नहीं शक्ति और भक्ति के नौ दिन यानी कि नवरात्रि स्थापना का पहला दिन भी यही हैद्य ऐसी मान्यता है कि इस दिन नक्षत्र शुभ स्थिति में आ जाते हैं और किसी भी नए काम को शुरू करने के लिए यह मुहूर्त शुभ होता हैद्य
सबसे प्राचीन काल गणना के आधार पर ही प्रतिपदा के दिन विक्रमी संवत् के रूप में इस शुभ एवं शौर्य दिवस को अभिषिक्त किया गया है। इसी दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामचन्द्रजी के राज्याभिषेक अथवा रोहण के रूप में मनाया गया। यह दिन वास्तव में असत्य पर सत्य की विजय को याद करने का दिवस है। इसी दिन महाराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हुआ था।अगर ज्योतिष की माने तो प्रत्येक संवत् का एक विशेष नाम होता है विभिन्न ग्रह इस संवत् के राजा, मंत्री और स्वामी होते हैं इन ग्रहों का असर वर्ष भर दिखाई देता है सिर्फ यही नहीं समाज को श्रेष्ठ (आर्य) मार्ग पर ले जाने के लिए स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन को ‘आर्य समाज’ स्थापना दिवस के रूप में चुना थाद्य इसी शुभ दिन महर्षि दयानन्द ने आर्यसमाज की स्थापना की थी। यह दिवस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक श्री केशव बलिराम हेडगेवार के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। पूरे भारत में इसी दिन से चैत्र नवरात्र की शुरूआत मानी जाती है। 
वैदिक संस्कृति से जोड़ता है हमें विक्रम संवत् -
पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री के अनुसार गुलामी के बाद अंग्रेजों ने हम पर ऐसा रंग चढ़ाया ताकि हम अपने नववर्ष को भूल उनके रंग में रंग जाएद्य उन्ही की तरह एक जनवरी को ही नववर्ष मनाये और हुआ भी यही लेकिन अब देशवासियों को यह याद दिलाना होगा कि उन्हें अपना भारतीय नववर्ष विक्रमी संवत बनाना चाहिए, जो 21 मार्च 2015 (शनिवार)को है
विक्रम संवत् ही हमें अपनी संस्कृति से जोड़ता हैद्य भारतीय संस्कृति से जुड़े सभी समुदाय विक्रम संवत् को एक साथ बिना प्रचार और नाटकीयता से परे होकर मनाते हैं और इसका अनुसरण करते हैं दुनिया का लगभग हर कैलेण्डर सर्दी के बाद बसंत ऋतु से ही प्रारम्भ होता हैद्य यही नहीं इस समय प्रचलित ईस्वी सन वाला कैलेण्डर को भी मार्च के महीने से ही प्रारंभ होना थाद्य इस कैलेण्डर को बनाने में कोई नयी खगोलीय गणना करने के बजाए सीधे से भारतीय कैलेण्डर (विक्रम संवत) में से ही उठा लिया गया था
हिंदी  12 महीनों के नाम -
ऐसा कहा जाता है कि पृथ्वी द्वारा 365ध्366 दिन में होने वाली सूर्य की परिक्रमा को वर्ष और इस अवधि में चंद्रमा द्वारा पृथ्वी के लगभग 12 चक्कर को आधार मानकर कैलेण्डर तैयार किया और क्रम संख्या के आधार पर उनके नाम रखे गए हैं हिंदी महीनों के 12 नाम हैं चैत्र, बैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन
हम कैसे मनायें नव वर्ष-नव संवत्सर -
इस भारतीय और वैदिक नव वर्ष की पर हमें दीपदान करना चाहिये। घरों में घण्टा-घडियाल व शंख बजाकर मंगल ध्वनि से नव वर्ष का स्वागत करें। इष्ट मित्रों को एसएमएस, इमेल एवं दूरभाष से नये वर्ष की शुभकामना भेजना प्रारम्भ कर देना चाहिये। नव वर्ष के दिन प्रातःकाल से पूर्व उठकर मंगलाचरण कर सूर्य को प्रणाम करें। हवन कर वातावरण शुद्ध करें। नये संकल्प करें। नवरात्रि के नो दिन साधना के शुरू हो जाते हैं तथा नवरात्र घट स्थापना की जाती है।
नव वर्ष का स्वागत करने के लिए अपने घर-द्वार को आम के पत्तों से अशोक पत्र से द्वार पर बन्दनवार लगाना चाहिये। नवीन वस्त्राभूषण धारण करना चाहिये। इसी दिन प्रातःकाल स्नान कर हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प और जल ले कर ‘ओम भूर्भुवः स्वः संवत्सर-अधिपति आवाहयामि पूजयामि च’ मंत्र से नव संवत्सर की पूजा करनी चाहिये एवं नव वर्ष के अशुभ फलों के निवारण हेतु ब्रह्माजी से प्रार्थना करनी चाहिये। हे भगवन्! आपकी कृपा से मेरा यह वर्ष मंगलमय एवं कल्याणकारी हो। इस संवत्सर के मध्य में आने वाले सभी अनिष्ट और विघ्न शांत हो जाये।
नव संवत्सर के दिन नीम के कोमल पत्तों और ऋतु काल के पुष्पों का चूर्ण बनाकर उसमें काली मिर्च, नमक, हींग, जीरा, मिश्री, इमली और अजवाइन मिलाकर खाने से रक्त विकार आदि शारीरिक रोग होने की संभावना नहीं रहती है तथा वर्षभर हम स्वस्थ रह सकते हैं। इतना न कर सके तो कम-से-कम चार-पाँच नीम की कोमल पत्त्यिाँ ही सेवन कर ले तो पर्याप्त रहता है। इससे चर्मरोग नहीं होते हैं। महाराष्ट्र में तथा मालवा में पूरनपोली या मीठी रोटी बनाने की प्रथा है। मराठी समाज में गुड़ी सजाकर भी बाहर लगाते हैं। यह गुड़ी नव वर्ष की पताका का ही स्वरूप है।
गुड़ी का अर्थ विजय पताका होती है। ‘युग‘ और ‘आदि‘ शब्दों की संधि से बना है ‘युगादि‘ । आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में ‘उगादि‘ और महाराष्ट्र में यह पर्व ‘गुड़ी पड़वा‘ के रूप में मनाया जाता है। विक्रमादित्य द्वारा शकों पर प्राप्त विजय तथा शालिवाहन द्वारा उन्हें भारत से बाहर निकालने पर इसी दिन आनंदोत्सव मनाया गया । इसी विजय के कारण प्रतिपदा को घर-घर पर ‘ध्वज पताकाएं’ तथा ‘गुढि़यां’ लगाई जाती है गुड़ी का मूल ३संस्कृत के गूर्दः से माना गया है जिसका अर्थ चिह्न, प्रतीक या पताका दृपतंग .आदि- कन्नड़ में कोडु जिसका मतलब है चोटी, ऊंचाई, शिखर, पताका आदि। मराठी में भी कोडि का अर्थ है शिखर, पताका। हिन्दी-पंजाबी में गुड़ी का एक अर्थ पतंग भी होता है। आसमान में ऊंचाई पर फहराने की वजह से इससे भी पताका का आशय स्थापित होता है।
भारत भर के सभी प्रान्तों में यह नव-वर्ष विभिन्न नामों से मनाया जाता है जो दिशा व स्थानानुसार सदैव मार्च-अप्रेल के माह में ही पड़ता है  गुड़ी पड़वा, होला मोहल्ला, युगादि, विशु, वैशाखी, कश्मीरी नवरेह, उगाडी, चेटीचंड, चित्रैय तिरुविजा आदि सभी की तिथि इस नव संवत्सर के आसपास ही आती है।
सच तो यह है कि विक्रम संवत् ही हमें अपनी संस्कृति की याद दिलाता है और कम से कम इस बात की अनुभूति तो होती है कि भारतीय संस्कृति से जुड़े सारे समुदाय इसे एक साथ बिना प्रचार प्रसार और नाटकीयता से परे हो कर मनाते हैं। हम सब भारतवासियों का कर्तव्य है कि पूर्ण रूप से वैज्ञानिक और भारतीय कैलेण्डर विक्रम संवत् के अनुसार इस दिन का स्वागत करें। पराधीनता एवं गुलामी के बाद अंग्रेजों ने हमें एक ऐसा रंग चढ़ाया कि हम अपने नव वर्ष को भूल कर-विस्मृत कर उनके रंग में रंग गये। उन्हीं की तरह एक जनवरी को नव वर्ष अधिकांश लोग मनाते आ रहे हैं। लेकिन अब देशवासी को अपनी भारतीयता के गौरव को याद कर नव वर्ष विक्रमी संवत् मनाना चाहिये 
क्या करें नव-संवत्सर के दिन (गुड़ी पड़वा विशेष)-
घर को ध्वजा, पताका, तोरण, बंदनवार, फूलों आदि से सजाएँ व अगरबत्ती, धूप आदि से सुगंधित करें।
-दिनभर भजन-कीर्तन कर शुभ कार्य करते हुए आनंदपूर्वक दिन बिताएँ।
सभी जीव मात्र तथा प्रकृति के लिए मंगल कामना करें।
नीम की पत्तियाँ खाएँ भी और खिलाएँ भी।
ब्राह्मण की अर्चना कर लोकहित में प्याऊ स्थापित करें।
इस दिन नए वर्ष का पंचांग या भविष्यफल ब्राह्मण के मुख से सुनें।
इस दिन से दुर्गा सप्तशती या रामायण का नौ-दिवसीय पाठ आरंभ करें।
इस दिन से परस्पर कटुता का भाव मिटाकर समता-भाव स्थापित करने का संकल्प लें।
इतिहास में वर्ष प्रतिपदा -
1.         ब्रह्मा द्वारा सृष्टि का सृजन
2.         मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम का राज्याभिषेक
3.         माँ दुर्गा की उपासना की नवरात्र व्रत का प्रारम्भ
4.         युगाब्द (युधिष्ठिर संवत्) का आरम्भ
5.         उज्जयिनी सम्राट- विक्रामादित्य द्वारा विक्रमी संवत् प्रारम्भ
6.         शालिवाहन शक संवत् (भारत सरकार का राष्ट्रीय पंचांग)
7.         महर्षि दयानन्द द्वारा आर्य समाज की स्थापना
8.         राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक परम पूजनीय सरसंघचालक केशव बलिराम हेडगेवार जी का जन्मदिन

आप सभी को नव वर्ष की अनेक-अनेक शुभकामनाएँ । यह वर्ष भारतीयों के लिये ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व के लिये भी सुख, शांति एवं मंगलमय हो।
-                                                                                                                                                                                                                                                 -हितेश शुक्ला

Wednesday, September 3, 2014

नियति के अन्याय का एक वर्ष...




                  मेरे बड़े  भाई  श्री सुरेन्द्र शुक्ला जिनका जन्म 1 नवम्बर 1976  को हुआ ! 5  सितम्बर 2013  को इस लोक से विदा ले ली ! उनको  इस दुनिया से गए को 5  सितम्बर 2014  को  एक वर्ष  हो जायेगा ! बस यादे भर  शेष है "नियति का  अन्याय ..." में नियति के अन्याय का एक वर्ष...बीत जाने के बाद के हालात और उनकी यादों को साझा करूँगा !
दुनिया  मेरे लिए उनका जाना  केवल  भाई का न होना ही नही बल्कि मेरी ताकत ,क्षमता, आत्म विश्वास का चले जाना है  ! मेरे बड़े भाई से बढ़ कर पिता की तरह थे जिन्होंने मेरे लिए पढाई छोड दी और मुझे खुले आकाश में उड़ने का अवसर दिया ! अवसर ही नही दिया खुद पर अंकुश लगा कर मुझे हर वो चीज उपलब्ध  करवाने की कोशिश  की जिसकी मुझे जब जरूरत लगी  ! वरना घर के हालात ऐसे न थे की में अपने मन की कर सकूँ ! आज में जहाँ हूँ  जो कुछ थोड़ा बहुत पाया है  या जो कुछ कर पा रहा हूँ  चाहे वह परिवार , समाज या खुद के लिए वह सब उनका दिया उनका सिखाया या उनके कारण है ! उन्होंने जीवन में हर पल सिखाया ! वे मेरे गुरु की तरह थे केवल किताबी नही जिंदगी के हर पहलु पर सिखाते रहे   मेने जबसे समझना शुरू किया तब से लेकर जब तक की उन्होंने अपने जीवन की  अंतिम साँस न ले ली.. शायद  ही मुझसे भाग्यशाली भाई कोई इस दुनिया में होगा जिसे मेरे भाई की तरह भाई मिले हो ! शायद ही कोई इतना दुर्भाग्य शाली इंसान होगा जो अपनी आँखों के सामने अपने भाई को जाते हुए देखता रहा पर कुछ  न  कर सका.… में उनकी यादें अपनी लेखनी से कुछ किश्तों में  उतारने की कोशिश करूँगा !  ताकि मेरे भाई के बारे आप भी  जान सके  की वाकई उनके जैसा  भाई शायद ही किसी को मिले या मिला हो ! और मेरे द्वारा की गयी उनकी तारीफ केवल किसी के जाने के बाद की औपचारिकता मात्र नही है...{निरंतर}

Thursday, August 28, 2014

" धारा ३७० राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती "

               
                                               अस्थायी अनुच्छेद है 370

भारत के एक राज्य के रूप में जम्मू.कश्मीर का 1947 से सम्बंध है लेकिन संविधान में अनुच्छेद 370 के अन्तर्गत कश्मीर को विषेष राज्य का दर्जा दिया गया लेकिन इस धारा के कारण भले ही कहा जाय कि जम्मू.कश्मीर  को विषेष राज्य का दर्जा है लेकिन वास्तविकता कुछ और है इस अनुच्छेद के कारण भारत का सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) के आदे से लगा कर भारतीय संसद द्वारा बनाए गए कोई भी कानून मानने को कश्मीर की सरकार बाध्य  नही है।
7 अक्तूबर 1949 को कश्मीर मामलों को देख रहे मंत्री गोपालस्वामी अयंगार ने भारत की संविधान सभा में अनुच्छेद-306(ए) (वर्तमान अनुच्छेद-370) को प्रस्तुत किया। डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की अध्यक्षता में गठित समिति द्वारा संविधान का जो मूल पाठ (ड्राफ्ट) प्रस्तुत किया गया था, उसमें यहअनुच्छेद-306(ए) सम्मिलित नहीं था। डॉ. अंबेडकर ने संविधान सभा में इस विषय पर एक भी शब्द नहीं बोला।
जब पं. नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को इस विषय पर बात करने के लिये डा. अम्बेडकर  के पास भेजा तो उन्होंने स्पष्ट रूप से शेख को कहा ”तुम यह चाहते हो कि भारत कश्मीर की रक्षा करे, कश्मीरियों को पूरे भारत में समान अधिकार हों, पर भारत और भारतीयों को तुम कश्मीर में कोई अधिकार नहीं देना चाहते। मैं भारत का कानून मंत्री हूं और मैं अपने देश के साथ इस प्रकार की धोखा-धड़ी और विश्वासघात में शामिल नहीं हो सकता।”
गोपालस्वामी अयंगार और मौलाना हसरत मोहानी के अतिरिक्त संविधान सभा में इस पर हुई बहस में किसी ने भी भाग नहीं लिया, यहां तक कि जम्मू-कश्मीर से चुने गये चारों सदस्य वहां उपस्थित होते हुए भी चुप रहे ।
कांग्रेस कार्यसमिति में कुछ ही दिन पूर्व इस प्रस्ताव पर दो दिन तक चर्चा हुई थी जिसमें गोपालस्वामी अयंगार अकेले पड़ गये। केवल मौलाना अब्दुल कलाम आजाद उनके एकमात्र समर्थक थे जिनको सबने चुप करा दिया था। ऐस माना जाता है कि नेहरू जी को इस आक्रोश का अंदाजा था, इसलिये वे पहले से ही विदेश यात्रा के नाम पर बाहर चले गये और अंत में अनमने भाव से नेहरू जी का सम्मान रखने के लिए सरदार पटेल को अयंगार के समर्थन में आना पड़ा और कांग्रेस दल ने नेहरू की इच्छा का सम्मान करते हुये इस अनुच्छेद को संविधान में शामिल करने का निर्णय लिया।
अनुच्छेद-370 : जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा का 1951 में गठन किया गया।
जम्मू-कश्मीर का अलग संविधान अनुच्छेद-370 की उत्पत्ति है। कांग्रेस ने ऑटोनामी (स्वायत्तता) के नाम पर शेख अब्दुल्ला के सामने घुटने क्यों टेके, जिसके अंतर्गत 1952 में पं. नेहरू ने निम्न बातों को स्वीकार किया
अनुच्छेद 370(ए) में प्रदत्त अधिकारों के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा के अनुमोदन के पश्चात् 17 नवम्बर 1952 को भारत के राष्ट्रपति ने अनुच्छेद-370 के राज्य में लागू होने का आदेश दिया।

·          शेष भारत के निवासी जम्मू-कश्मीर में न तो सरकारी नौकरी प्राप्त कर सकते हैं और न ही जमीन खरीद सकते हैं। उनको राज्य के अंतर्गत वोट देने का अधिकार भी नहीं है।.
·         • जम्मू-कश्मीर राज्य का अलग संविधान व अलग झंडा रहेगा। भारत के राष्ट्रीय ध्वज के समान ही जम्मू-कश्मीर के राज्य ध्वज को राज्य में सम्मान प्राप्त होगा।
·         • मुख्यमंत्री, राज्यपाल के स्थान पर जम्मू कश्मीर में सदरे रियासत (राज्य अध्यक्ष), वजीरे आजम (प्रधानमंत्री) कहलाये जायेंगे।
·         • स्थायी निवासी प्रमाण पत्र की व्यवस्था, जिसके द्वारा शेष भारत का व्यक्ति जम्मू-कश्मीर में बस नहीं सकेगा, परन्तु जम्मू-कश्मीर का व्यक्ति देश में कहीं भी जाकर बस सकता है।
·         • सदरे रियासत का चुनाव जम्मू-कश्मीर की विधानसभा करेगी, राष्ट्रपति केन्द्र सरकार की सलाह पर सदरे रियासत अर्थात राज्यपाल को नियुक्त नहीं कर सकेगा।
·         • सर्वोच्च न्यायालय का दखल कुछ ही क्षेत्रों में सीमित रहेगा।
·         • भारत का चुनाव आयोग, प्रशासनिक सेवा अधिकरण (आई.ए.एस एवं आई.पी.एस.), महालेखा नियंत्रक के अधिकार क्षेत्र में जम्मू-कश्मीर नहीं रहे !

                                      दुष्प्रचार....
यह झूठा दुष्प्रचार है कि महाराजा हरिसिंह बाकी राजाओं की तरह रियासत को भारत के साथ एकात्म नहीं करना चाहते थे।जम्मू-कश्मीर के संविधान की प्रस्तावना में स्पष्ट कहा गया है-हम जम्मू-कश्मीर के लोगों ने एकमत से स्वीकार किया है, …… 26 अक्तूबर 1947 के जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के उपरांत पुनर्परिभाषित करते हैं कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है,…             हम भारत की एकता-अखंडता के प्रति प्रतिबद्ध हैं।
महाराजा हरिसिंह ने उसी विलय प्रपत्र पर हस्ताक्षर किये, जिस पर शेष 568 रियासतों ने हस्ताक्षर किये थे। इस प्रपत्र का मसौदा उस समय के गृह मंत्रालय द्वारा तैयार किया गया था, जिसे लेकर स्वयं गृह सचिव वी.पी. मेनन महाराजा हरिसिंह के पास आये थे।
{ चित्र - जम्मू कश्मीर   का  भारत संघ में  संम्पूर्ण विलय का पत्र }


                                कश्मीरियों के ही विरू़द्ध है धारा 370

1 जम्मू.कश्मीर मे महिलाओं पर शरिया कानून लागू होता है यदि काष्मीर की लडकी किसी भारत के अन्य राज्य के युवक  से विवाह करती है तो उसकी नागरिकता छिन जाएगी वही पाकिस्तानी लडके से शादी कर ले तो उसकी नागरिकता यथावत रहेगी
2. जम्मू.कश्मीर में हिन्दू एवं सिख समूदाय अल्पसंख्यक (16 प्रतिशत) है फिर भी उन्हे आरक्षण नही दिया जाता है
 3 जम्मू.कश्मीर  न सूचना अधिकार, अनिवार्य शिक्षा एवं मनरेगा जैसी योजनाएं भी लागू नही हो सकती इसके कारण बेरोजगारी भूखमरी और अशिक्षा है
              मंडल आयोग की रिपोर्ट न लागू होने के कारण यहां पिछड़ी जातियों को आरक्षण नहीं है
  • 1947 से 2007 तक कश्मीर घाटी में हरिजनों को कोई आरक्षण प्राप्त नहीं हुआ। सर्वोच्च न्यायालय के 2007 के निर्णय, जिसके अंतर्गत हरिजनों को कश्मीर घाटी में आरक्षण प्राप्त हुआ, को भी सरकार ने विधानसभा में कानून द्वारा बदलने का प्रयास किया, जो जनांदोलन के दबाव में वापिस लेना पड़ा।
·         संपत्ति कर, उपहार कर, शहरी संपत्ति हदबंदी विधेयक (Wealth tax, Gift tax, Urban Land Ceiling Act)  आदि कानून लागू नहीं होते।
  • शासन के विकेन्द्रीकरण के 73 एवं 74 वें संविधान संशोधन को अभी तक लागू नहीं किया गया। गत 67 वर्षों में केवल 4 बार पंचायत के चुनाव हुए।
  • आज भी भारतीय संविधान की 135 धारायें यहां लागू नहीं हैं। यहां भारतीय दण्ड विधान (Indian Penal Code ) के स्थान पर रणवीर पैनल कोड (आर.पी.सी.) लागू है।
  • अनुसूचित जनजाति के समाज को राजनैतिक आरक्षण अभी तक प्राप्त नहीं है।
  • कानून की मनमानी व्याख्याओं के कारण जम्मू व लद्दाख को विधानसभा व लोकसभा में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। जम्मू का क्षेत्रफल व वोट अधिक होने के बाद भी लोकसभा व राज्य विधानसभा में प्रतिनिधित्व कम है। लेह जिले में दो विधानसभाओं का कुल क्षेत्रफल 46000 वर्ग किमी. है।
  • सारे देश में लोकसभा क्षेत्रों का 2002 के पश्चात पुनर्गठन हुआ, परन्तु जम्मू-कश्मीर में नहीं हुआ।
  • यहां विधानसभा का कार्यकाल 6 वर्ष है जबकि पूरे देश में यह 5 वर्ष है।
·         भारत के राष्ट्रपति में निहित अनेक आपातकालीन अधिकार यहां लागू नहीं होते।008 में राज्य को प्रति व्यक्ति केन्द्रीय सहायता 9754 रूपये थी जबकि बिहार जैसे बड़े राज्य को 876 रूपये प्रति व्यक्ति थी। कश्मीर को इसमें से 90 प्रतिशत अनुदान होता है और 10 प्रतिशत वापिस करना होता है, जबकि शेष राज्यों को 70 प्रतिशत वापिस करना होता है।
                                                जम्मू से भेदभाव
जम्मू क्षेत्र के 26 हजार वर्ग किमी. क्षेत्र में 2002 की गणनानुसार 30,59,986 मतदाता थे। आज भी 2/3 क्षेत्र पहाड़ी, दुष्कर, सड़क-संचार-संपर्क से कटा होने के पश्चात भी 37 विधानसभा क्षेत्र हैं व 2 लोक सभा क्षेत्र। जबकि कश्मीर घाटी में 15,953 वर्ग किमी. क्षेत्रफल, 29 लाख मतदाता, अधिकांश मैदानी क्षेत्र एवं पूरी तरह से एक-दूसरे से जुड़ा, पर विधानसभा में 46 प्रतिनिधि एवं तीन लोकसभा क्षेत्र हैं।
                                  अस्थायी अनुच्छेद 370 के दुष्परिणाम
1947 में जम्मू-कश्मीर में पश्चिम पाकिस्तान से आये हिन्दू शरणार्थी (आज लगभग दो लाख) अभी भी नागरिकता के मूल अधिकारों से वंचित हैं, जबकि तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला ने ही खाली पड़ी सीमाओं की रक्षा के लिए यहां उनको बसाया था। इनमें अधिकतर हरिजन और पिछड़ी जातियों के हैं। इनके बच्चों को न छात्रवृति मिलती है और न ही व्यावसायिक पाठयक्रमों में प्रवेश का अधिकार है। सरकारी नौकरी, संपत्ति क्रय-विक्रय तथा स्थानीय निकाय चुनाव में मतदान का भी अधिकार नहीं है। 63 वर्षों के पश्चात भी अपने ही देश में वे गुलामों की तरह जीवन जी रहे हैं।
  • शेष भारत से आकर यहां रहने वाले व कार्य करने वाले प्रशासनिक, पुलिस सेवा के अधिकारी भी इन नागरिकता के मूल अधिकारों से वंचित है। 30-35 वर्ष इस राज्य में सेवा करने के पश्चात भी इन्हें अपने बच्चों को उच्च शिक्षा हेतु राज्य से बाहर भेजना पड़ता है और सेवानिवृति के बाद वे यहां एक मकान भी बनाकर नहीं रह सकते।
  • 1956 में जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री बख्शी गुलाम मुहम्मद ने जम्मू शहर में सफाई व्यवस्था में सहयोग करने के लिये अमृतसर (पंजाब) से 70 बाल्मीकि परिवारों को निमंत्रित किया। 54 वर्ष की दीर्घ अवधि के पश्चात भी उन्हें राज्य के अन्य नागरिकों के समान अधिकार नहीं मिले। उनके बच्चे चाहे कितनी भी शिक्षा प्राप्त कर लें, जम्मू-कश्मीर के संविधान के अनुसार केवल सफाई कर्मचारी की नौकरी के लिये ही पात्र हैं। आज उनके लगभग 600 परिवार हैं लेकिन उनकी आवासीय कॉलोनी को भी अभी तक नियमित नहीं किया गया है।
·         1947 में जम्मू-कश्मीर में पश्चिम पाकिस्तान से आये हिन्दू शरणार्थी (आज लगभग दो लाख) अभी भी नागरिकता के मूल अधिकारों से वंचित हैं, इनमें अधिकतर हरिजन और पिछड़ी जातियों के हैं। इनके बच्चों को न छात्रवृति मिलती है और न ही व्यावसायिक पाठयक्रमों में प्रवेश का अधिकार है। सरकारी नौकरी, संपत्ति क्रय-विक्रय तथा स्थानीय निकाय चुनाव में मतदान का भी अधिकार नहीं है। 63 वर्षों के पश्चात भी अपने ही देश में वे गुलामों की तरह जीवन जी रहे हैं।
          अनुच्छेद-370 के कारण जम्मू-कश्मीर की पूरे भारत के साथ सहज एकात्मता समाप्त हो गई। कश्मीर घाटी को तो      ऐसा स्थान बना दिया गया है जहां देश का कोई भी व्यक्ति अपने आप को बाहरी अनुभव करता है।
देश चाहता है इन सवालों के जबाव
जम्मू-कश्मीर के विषय में कांग्रेस की नीति पहले से ही अस्पष्ट थी। जम्मू-कश्मीर की गत 63 वर्षों की समस्या का कारण केवल कांग्रेस नेतृत्व की सरकारों द्वारा लिये गये निर्णय हैं। अब समय आ गया है कि देश की जनता को इन सवालों पर हर गली-मोहल्ले-चौक पर कांग्रेस के नेताओं से और विशेषकर नेहरू खानदान से निम्न सवाल करने चाहिए –
1. 1946 में जम्मू-कश्मीर के लोकप्रिय महाराजा को हटाने के लिये नेशनल कांफ्रेंस के तत्कालीन नेता शेख अब्दुल्ला ने ”कश्मीर छोड़ो” (Quit Kashmir) आंदोलन छेड़ा।  वह देश की आजादी का समय था, ऐसे समय किसी भी रियासत में ऐसे आंदोलन का कोई औचित्य नहीं था।
2. विलय होने के पश्चात नेहरू जी एवं उनकी सरकार ने जनमत संगह कराने की अवैधानिक, एकतरफा घोषणा क्यों की ?
5. पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों को खाली कराये बिना हम संयुक्त राष्ट्र संघ में 1 जनवरी, 1948 को क्यों गये ? भारत की सेना आगे बढ़कर पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों को वापिस लेना चाहती थी, परन्तु उसे अनुमति क्यों नहीं दी गई ? 6. पी.ओ.के. में 50 हजार हिन्दू-सिखों के नरसंहार का जिम्मेदार कौन है?
7. पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (पी.ओ.के.) के लाखों शरणार्थी 63 वर्षों से विस्थापित कैंपों में ही रहते हैं। सरकार जबाव दे कि 63 वर्षों से पी.ओ.के. को वापिस लेने के लिये हमने क्या किया?
8. 1965 एवं 1971 में युध्द जीतने के बाद भी अपने क्षेत्र वापिस लेने के स्थान पर 1972 में शिमला समझौते में छम्ब का क्षेत्र भी हमने पाकिस्तान को क्यों दे दिया ?
9. संविधान सभा में जम्मू-कश्मीर का प्रतिनिधित्व स्वाधीनता अधिनियम 1947, का उल्लंघन कर महाराजा हरिसिंह के स्थान पर शेख अब्दुल्ला की इच्छा के अनुसार नेशनल कांफ्रेंस के प्रतिनिधियों को प्रतिनिधित्व देने के लिये संविधान सभा में प्रस्ताव क्यों लाया गया ? इसी कारण से संविधान निर्माण के समय शेख अब्दुल्ला को अनुच्छेद-370 के लिये दबाव बनाने का मौका मिला।
10. भारत की संविधान सभा में प्रस्ताव लाकर जम्मू-कश्मीर नाम से जम्मू को हटाकर राज्य का नाम कश्मीर रखने का असफल प्रयास पं. नेहरू और गोपालस्वामी अयंगार ने क्यों किया?
11. डा. अंबेडकर, पूरी संविधान सभा, पूरी कांग्रेस पार्टी के विरोध के बाद भी अनुच्छेद-306(ए) (बाद में अनुच्छेद-370) लाने की जिद पं. नेहरू ने क्यों की?
वास्तव में जम्मू-कश्मीर समस्या का मूल जम्मू-कश्मीर में नहीं है अपितु नई दिल्ली की केन्द्र सरकार में निहित है। इसलिये इसका समाधान भी जम्मू-कश्मीर को नहीं पूरे भारत को मिलकर खोजना है। समय आ गया है कि 63 वर्षों की कांग्रेस की नेहरूवादी सोच के स्थान पर भारतीय संविधान की मूल भावना एकजन-एकराष्ट्र को स्थापित किया जाय तथा अलग संविधान, अलग झंडा, अनुच्छेद-370 जैसी अलगाववादी मानसिकता को बढ़ावा देने वाली व्यवस्थाओं को समाप्त किया जाये।
यह आजाद भारत की सबसे बड़ी असफलता है कि 63 वर्षों में लाखों करोड़ रूपये खर्च कर, हजारों सैनिकों के बलिदान के पश्चात भी जम्मू-कश्मीर की देश के साथ मानसिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक एकात्मता उत्पन्न नहीं की जा सकी। अनुच्छेद-370 के कारण वहां हमेशा एक एहसास रहता है कि हमारी एक अलग राष्ट्रीयता है, हम शेष भारत से अलग हैं। यहां का मीडिया एवं नेता हर समय इसे भारत के कब्जे वाला कश्मीर (India occupied Kashmir) ही संबोधित करते हैं।
भारत हर वर्ष अनुदान बढ़ाता रहता है। पिछले 20 वषों में 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक की केन्द्रीय सहायता-अनुदान कश्मीर को दिये गये। इससे अधिक विशेष बजटीय प्रावधान किये गये। यह परंपरा बन गयी कि प्रधानमंत्री के प्रत्येक दौरे में हजारों करोड़ के विशेष पैकेज की घोषणा की जाय। परन्तु फिर भी अलगाववाद बढ़ता ही जा रहा है। आवश्यकता है घाटी तथा देश की सभी शक्तियों को बताने की कि अनुच्छेद-370 की समाप्ति, अलग संविधान और अलग निशान की समाप्ति ही अलगाववाद की समाप्ति का एकमात्र उपाय है और यह कार्य तुरन्त होना चाहिये ताकि उमर, महबूबा, गिलानी, मीरवायज एवं शेष देश के मुस्लिम वोट के भूखे, स्वार्थी, सत्तालोलुप नेता कोई नयी दुविधाजनक, राष्ट्रघाती परिस्थिति देश के सामने उत्पन्न न कर सकें


                                                      डॉ० श्यामाप्रसाद मुखर्जी 


 (जन्म: 6 जुलाई, 1901 - मृत्यु: 23 जून, 1953) महान शिक्षाविद्, चिन्तक और भारतीय जनसंघ के संस्थापक थे। एक प्रखर राष्ट्रवादी के रूप में भारतवर्ष की जनता उन्हें स्मरण करती है। एक कट्टर राष्ट्र भक्त के रूप में उनकी मिसाल दी जाती है।
डॉ० मुखर्जी जम्मू कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे। उस समय जम्मू कश्मीर का अलग झण्डा और अलग संविधान था। वहाँ का मुख्यमन्त्री (वजीरे-आज़म) अर्थात् प्रधानमन्त्री कहलाता था। ऐसी परिस्थितियों में डॉ० मुखर्जी ने जोरदार नारा बुलन्द किया - "एक देश में दो निशान, एक देश में दो प्रधान, एक देश में दो विधान - नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगें।" संसद में अपने ऐतिहासिक भाषण में डॉ० मुखर्जी ने धारा-370 को समाप्त करने की भी जोरदार वकालत की। अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त किया था कि या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊँगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपना जीवन बलिदान कर दूँगा। उन्होंने तात्कालिन नेहरू सरकार को चुनौती दी तथा अपने दृढ़ निश्चय पर अटल रहे। अपने संकल्प को पूरा करने के लिये वे 1953 में बिना परमिट लिये जम्मू कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े। वहाँ पहुँचते ही उन्हें गिरफ्तार कर नज़रबन्द कर लिया गया। 23 जून, 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी। इस प्रकार वे भारत के लिये एक प्रकार से शहीद हो गये। डॉ० श्यामाप्रसाद मुखर्जी के रूप में भारत ने एक ऐसा व्यक्तित्व खो दिया जो हिन्दुस्तान को नयी दिशा दे सकता था।